Friday, August 14, 2020

आतंकवाद से संबंधित कविता "बर्दाश्त की हद" (स्वरचित कविता)

क्या तारीफ ए काबिल है?बर्दाश्त की यह हद
दिनों दिन फेंकी जा रही है,मौतें बारूदो में लद
अचरज नहीं है,मुझे आतंकवादियों की गति से
अचरज है,मुझे अपनों पर अपनों की मति से|

लाल हो गया गुलाबी शहर,
गुजरात में भी फैल गया जहर,
बम की ज्वाला फटती आठों पहर,
अब तो उठाओ,बदलाव की एक लहर|

वक्त था,जब एक मौत पर,
पूरा देश मातम मनाता था..
वक्त था जब एक सिसकी पर,
पूरा देश बिलकता था..
वक्त था जब एक आंसू पर,
पूरा देश हंसना भूल जाता था..
वक्त था जब एक पुकार पर,
पूरा देश दौड़ पड़ता था..

आज तो कर्राह उठी,मेरे देश की राजधानी
छर्रा से छिद् गए मासूम बच्चे व बहुरानी
देखते रहे हम वह कहलाने वाली स्वाभिमानी
आखिर कैसे सह पाए,सिरफिरौ की यह मनमानी

देश के पहरूओं!इस आग को बुझाने के लिए जरूरत नहीं है पानी की,
जरूरत है,एक और चिंगारीअपने दिल में उठाने की|

लो पुकारा है,हमने पूरे देश को
मिटा दो हाथ पर हाथ धरे इस परिवेश को

तोड़ दो सारे फिजूल की कस्टम
पूरा बदल ही दो देश का यह सिस्टम

हर घर में जन्मे एम.सी.शर्मा जैसी औलाद
एक नारा और लगा दो 'भारत छोड़ो आतंकवाद'|

देख रहे हैं,बारंबार बना खबर इन्हें हम टी.वी.स्क्रीन पर..
जान लीजिए आतंकवाद के अगले
हम ही है निशाने पर..

अगर जान कर भी हम चुप हैं बेहद
तो शर्म की काबिल है 'बर्दाश्त की हद'||

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