आचार्य शुक्ल के अनुसार बोधा एक रसिक कवि थे। पन्ना के राजदरबार में बोधा अक्सर जाया करते थे। राजदरबार में सुबहान (सुभान) नामक वेश्या से इन्हें बेहद प्रेम हो गया। महाराज को जब यह बात पता चली तो उन्होंने बोधा को छह महीने के देशनिकाले की सजा दे दी। वेश्या के वियोग में बोधा ने विरहवारीश नामक पुस्तक लिख डाली। छह महीने बाद राजदरबार में हाजिर हुए तो महाराज ने पूछा - "कहिये कविराज! अकल ठिकाने आयी? इन दिनों कुछ लिखा क्या?" इस पर बोधा ने अपनी पुस्तक विरहवारीश के कुछ कवित्त सुनाये। महाराज ने कहा - "शृंगार की बातें बहुत हो चुकीं अब कुछ नीति की बात बताइये।" इस पर बोधा ने एक छन्द कहा-
हिलि मिलि जानै तासों मिलि के जनावै हेत, हित को न जानै ताको हितू न विसाहिए।
होय मगरूर तापै दूनी मगरूरी करै, लघु ह्वै के चलै तासों लघुता निवाहिए॥
बोधा कवि नीति को निबेरो यही भाँति अहै, आपको सराहै ताहि आपहू सराहिए।
दाता कहा, सूर कहा, सुन्दरी सुजान कहा, आपको न चाहै ताके बाप को न चाहिए॥
महाराज ने बोधा से प्रसन्न होकर कुछ माँगने को कहा। इस पर बोधा के मुख से निकला - "सुभान अल्लाह!" महाराज उनकी हाजिरजवाबी से बहुत खुश हुए और उन्होंने अपनी बेहद खूबसूरत राजनर्तकी (सुबहान) बोधा को उपहार में दे दी। इस प्रकार बोधा के मन की मुराद पूरी हुई।[2]