Tuesday, October 20, 2026

'खरगोश का सोना...उस दिन'

कितना मुश्किल था उस दिन
लेखक के लिए खरगोश को हराना...

कितना आसान था उस दिन
खरगोश के लिए दौड़ का जीत जाना...

कछुए की जीत से ज्यादा जरूरी था
खरगोश का गहरी नींद में सो जाना...

अब इस दौड़ में मैं ही रह गया हूँ अकेला
ज्यादा जरूरी था कछुए का यह महसूस कर पाना...

अब कठिन नहीं है डगर, ना दूर है मंजिल
अब तो साफ है बेशक मेरा ही जीत जाना...

जिस दौड़ में और कोई है नहीं मेरे अलावा
अब तो यह दौड़ नहीं, एक सफर है सुहाना...

पर मुझे नहीं है कहीं और जाना
मुझे तो बस मंजिल को पार कर जाना...

नहीं रुकूँगा, नहीं मुड़ूँगा, नहीं थकूँगा
इतिहास है रचना, मुझे देख रहा है जमाना...

रफ़्तार तो जीत कर भी नहीं बदल पाएगी कभी
रफ़्तार को लेकर जमाने का नजरिया है बदलना...

खरगोश का सोना महज सोना नहीं था उस दिन
कछुए के मन में जीत के विश्वास को था जगाना...

हमें भी अविश्वास के खरगोश को सुलाना है हर दिन
क्योंकि हमें भी उस पार खड़ी मंजिल को गले है लगाना...
.....उस दिन

'खरगोश का सोना...उस दिन'

कितना मुश्किल था उस दिन लेखक के लिए खरगोश को हराना... कितना आसान था उस दिन खरगोश के लिए दौड़ का जीत जाना... कछुए की जीत से ज्य...