Wednesday, August 26, 2020

5 सितंबर का दिन था (स्वरचित कविता)


5 सितंबर का दिन था..
मन यह सोचने में लीन था
जीवन का सुधारा किसने सीन था
इसी विचार से मैं थोड़ा खिन्न था।

5 सितंबर का दिन था..

एक ही मां के दो बच्चों में,
एक आदमी तो एक हैवान क्यों
एक ही पिता के दो बच्चों में,
एक पुलिस तो एक चोर क्यों?
एक ही कक्षा के सारे बच्चों में,
कुछ काबिल तो कुछ कमजोर क्यों?
एक ही समाज के लोगों में,
कुछ सेवी तो कुछ पापी क्यों?

5 सितंबर का दिन था..

जिंदगी के हर मोड़ पर शिक्षक मिले कई
पर सीखने के लिए शिक्षक का ही होना काफी नहीं
चींटी से भी सीख ली जा सकती है नई
अगर सीखने वाला सच्चा शिक्षार्थी हो कहीं

5 सितंबर का दिन था..

सबकी जिंदगी के रंगमंच में होता है अंतर
हालात और परिस्थिति से बड़ा नहीं कोई सिकंदर
आज तक जान न पाया कोई यह जंतर-मंतर
यह बन शिक्षक बदलता है सब का मुकद्दर

5 सितंबर का दिन था..

हालात और परिस्थिति के आगे झुकी हर पढ़ाई
तहे दिल से इन्हे ही शिक्षक दिवस की हो बधाई।

5 सितंबर का दिन था..

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