Tuesday, August 25, 2020

सफर, लाडो से लाडी तक का (स्वरचित कविता)




एक अनजाने घर के सामने
एक अनजानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरी किस्मत ने
घबराहट थी दिल की थाह मेंl

सब लोग दौड़ पड़े मेरी ओर,
लाडी आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर
मैं इठला पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडो हूं आपकी लाडी किस ठौर?

लोग नए, रिश्ते नए
घर नए ,परिवार नए
यहां तक की खिड़कियां नई
तो कबर्ड भी नएl

पर सच तो है यह सब नया नहीं,
पुराना दस्तूर है सदियों का कई

यह एक ही जिंदगी में मिलने वाला
औरत का दूसरा जन्म है सही?
मेरे साथ भी यह सब होने वाला
उस दिन,समझ ना पाईl

यह सिर्फ नया सफर ही नहीं,
इसकी मंजिल भी नई होगीl
अब से परिवार मेरा नहीं,
मैं परिवार के लिए होंऊंगीl
अब से मैं किसी की चिंता नहीं,
सारी चिंताएं मेरी होगीl
जी हां अब से मैं लाडो नहीं,
लाडी कहलाऊंगीl

खैर वक्त की तस्वीर बदलती गई,
रिश्तो की डोर सुलझती गई,
तनाव के नसे की मैं आदी होती गई
शायद दूसरा अध्याय समझती गईl

आज कई सालों बाद,

पुराने घर के सामने,
पुरानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरे हमसफ़र ने,
उत्साह था दिल की थाह में,

मां दौड़ी मेरी ओर,
लाडो आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर।
मैं मुस्कुरा पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडी हूं आपकी लाडो किस ठौर?

बहुत ही छोटा फेरबदल है इन शब्दों का
पर बहुत लंबा हैlसफर,लाडो से लाडी तक का l

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