Wednesday, August 19, 2020

उड़ता देख पंछी (स्वरचित कविता)





मैं पर कटा पंछी...
उड़ता है पंछी

उस खुले आसमान में,
कभी यहां तो कभी वहां

लगता है सुहाना
खिलती है मुस्कान

पर रोता है मन..
काश पंख होते मेरे भी
उड़ता देख पंछी मैं भी
उस खुले आसमान में,
कभी यहां कभी वहां
उड़ता देख पंछी...

पर ना नीचे समझ मुझे तो इतना
मैं भी उठ सकता हूं उतना
तू क्या जाने दर्द मुझे दिया तूने ही कितना

पंख काट कर तूने उजड़ा मेरा घरौंदा
उस पर मेरे पंख लगाकर बन बैठा है तू परिंदा

पर तू ना कर अभिमान
होगा मेरा भी सम्मान

आएगा ऐसा समय भी
उडूंगा ए पंछी मैं भी

हारा नहीं है अभी दिल
उड़ना बाकी है अभी कई मील

कहता है मन-पंछी
उड़ता देख पंछी..

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