Thursday, August 20, 2020

जंग हो बस प्यार से (स्वरचित कविता)

सब के सब स्तब्ध खड़े हैं.
पास अपनों के सर काटे हैं..

घना सन्नाटा चारों ओर फैला है
देखने वालों के लिए
सूरज भी उस दिन का मेला है

बोझिल हवा बनी है बारूदो से..
खौफनाक वादिया बनी है चित्तकारों से

सहमें पक्षी घुस बैठे हैं घोसलों में
चिपकाकर शावकों को अपने पैरों में
और कहते हैं अपनी जुबान में
'दिल न रहा इंसानों में रूप बदला किसानों में

ऐसा किसान जो हथियार बोये
हल की जगह खेत बंदूकों से जोते
और परमाणु बम से उसे सीचें..

जबकि उसी के बच्चे रोटी को तरसे
भूख अकाल का बादल बरसे
अपनों का साया उठे बच्चों के सर से
हैवान बन गया है वह आमदर से

मां का सिसकना रातों में
उनका याद आना हर बातों में

बेजुबान बच्चे ने जुबान चलाई
'मां सुनी है क्यों तेरी कलाई
गर्व से बतलाई उस नौजवान की भलाई
यह सुखी आंसुओं की रेख,यह सुनी कलाई

पूछे किससे बस यह एक सवाल
क्यों हुआ दो भाइयों के बीच बवाल

क्यों जली यह जहरीली आग
कुछ नहीं,बस जलना था मेरा सुहाग

बता क्या बदली तेरी तस्वीर
हां!बस फूटी है तो मेरी तकदीर

क्यों होती है जंग हर रोज
क्यों ना तू बरसो खोया भाई खोज

क्यों बनी है यह सरहद बीच
पार-उस पार क्यों बेचता है ना चीज

इतने में एक आंसू सावक-आंख से आ लूढ़ा

पंछी उसे गला गले लगा हंसकर बोला
आदमी चाहता है बनना मौला
इसी होड़ में पहना है गंदा स्वार्थी चोला
तू क्यों रोता है ए भोला!

है हम ही सच्ची आजादी से लद
अपनी नहीं है,बंधन नहीं है,सरहद

है अपनी ही सारी जमीं
अंबर के स्वामी है हमीं

हम नदी और हवा के झोंके
हैं किसमें वह ताकत जो हमें रोके

जिस दिन इंसान ये कसम खाएगा
जंग को ना वह कभी आएगा
उस दिन का सूरज जब देखेगा
जब यह फासला ही मिट जाएगा
सच्ची आजादी जब वह समझेगा
तभी ये दर्द मिट पाएगा

और कहेगा अपने यार से..
आओ!दोस्त जंग लड़े नए हथियार से
नफरत से नहीं बस प्यार से...
जंग हो बस प्यार से

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