Monday, August 31, 2020

मेरे स्कूल के दिन (स्वरचित कविता)


मेरे स्कूल के दिन...
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

मेरे स्कूल के दिन..

खिड़की के पर्दे से झांक रही हल्की रोशनी मे उठा करते थे
सीपी सी अध खुली आंखों से ही नहा लिया करते थे,
चटकीली नीली गगरी उस पर सफेद कमीज
पहन कहर ढाया करते थे,
लाल रिबन से दो चोटियों बांध घंटों शीशे के सामने खुद को संवारा करते थेl

आहा!मेरे स्कूल के दिन...

आज लंच बॉक्स में क्या है?मां जैसे सवाल
तो दिनचर्या के हिस्से हुआ करते थे,
घंटों रगड़ कर काले जूतों को भी सफेदी सा चमका दिया करते थे,
झुलते मौजों में रबड़ बांध उनमें जान फूंक दिया करते थे,
भले कबाड़ से जुगाड़ हो पर कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं किया करते थे,


मेरे स्कूल के दिन...

सुबह की घनघोर घटाओं से प्यारी चिड़िया की चहचहाहट हुआ करती थी,
उससे भी प्यारी दूर कहीं से आती हुई स्कूल की घंटी की आवाज हुआ करती थी,
पीटीआई मैडम के डर से मिनटों में सफर पैदल ही तय कर लिया करती थी,
रास्ते में हर बूढ़े इंसान से जय राम जी की काकी कह कर सारे रिश्तो के बीज बिखेरा करती थी,

मेरे स्कूल के दिन..

24 घंटों मे चंद पलों की प्रार्थना में न जाने आंखें खोलकर क्या राज देखा करती थी,
खुद की गलती ना पकड़े जाने पर अक्सर गढ़ जीत लिया करती थी,
सोमवार से आखिरी दिन तक यूनिफॉर्म को हथेली के छाले की तरह रखा करती थी,
क्योंकि उस वक्त इस्त्री सप्ताह में 1 दिन ही हुआ करती थी,
स्वच्छता अनुक्रमाणिका से लेकर सर्वश्रेष्ठ की अंक तालिका तक अक्सर में छाए रहा करती थी,
स्कूल की बाई जी मुझे लाडली कह कर पुकारा करती थी,
हर अध्यापक की में चहेती हुआ करती थी

मेरे स्कूल के दिन...

इंटरवल को हम रेसिस बोला करती थी,
पावलव थ्योरी के अनुसार न जाने क्यों रेसिस की घंटी बजने से ही तेज भूख लग जाया करती थी,
इंटरवल के आधे घंटे में जिंदगी की सारी हंसी खेल खेल लिया करती थी,
पर भाग्य से मेरी पकड़ने की बारी आती ही इंटरवेल की घंटी बज जाया करती थीl

मेरे स्कूल के दिन..

गणितीय सूत्र हो या रसायन सूत्र ट्रिक बनाकर
तोते की तरह ही रख लिया करती थी,
पर सामाजिक इतिहास के लंबे-लंबे पन्ने गिन कर ही घबरा जाया करती थी,
SUPW कैंप की तो बात ही क्या!
360 दिनों के बंदिश की भड़ास उन 5 दिनों की आजादी के जश्न में निकाल दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हमारी कक्षा प्रिंसिपल ऑफिस के पास लगा करती थी,
क्योंकि हम बदमाशी में भी अव्वल रहा करती थी,
बिन बातें हम सहेलियां घंटों बतलाया करती थी,
मुंह पर अंगुली रखने वाली सजा में दूसरी उंगली से स्लेट पर लिख लिख कर बातें किया करती थी..
वैकल्पिक प्रश्न पत्र तो हम इशारों में ही पूरे कर लिया करती थी,
एक नंबर गलत कट जाने पर अध्यापक से घंटों लड़ा करती थी,
और एक नंबर अतिरिक्त मिल जाने पर आईआईटी की डिग्री ही जीत लिया करती थी,
खुद से ज्यादा आरामदायक जगह तो अपने बैग को दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हम स्कूल को विद्या मंदिर कहा करती थी,
दोस्तों हम मां सरस्वती की सौगंध पर ही पूरा सच उगल लिया करती थी,
इन छोटी-छोटी बर्फ के टुकड़ों सी खुशियों से ही हम आनंद का हिमालय खड़ा कर लिया करती थी,
जी हां! हम तितलियों की तरह अपने गुलिस्ता की महारानियां कहलाया करती थी

मेरे स्कूल के दिन..
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

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