Friday, September 4, 2020

वह मेरी शिक्षिका थी (स्वरचित कविता)


बचपन में मां जिसके भरोसे मुझे स्कूल छोड़कर निश्चिंत लौट जाया करती थी..
मां की याद में जिसका आंचल मे सिसका करती थी..
पानी की बोतल और टिफिन का ढक्कन जिसने खोलना सिखाया..वह मेरी शिक्षिका थी
दिन को रात भी अगर जिसने कह दिया उस पर भी विश्वास करने वाला अंधविश्वास जिसका था वह मेरी पहली शिक्षिका थी..

मेरी प्राइमरी शिक्षिका शिक्षिका नहीं मेरी दूसरी मां-सी थी

ज्ञान तो किताबों में भी पड़ा है जो व्यावहारिक ज्ञान दिया करती थी...
सैद्धांतिक तरीके से उठना बैठना आना-जाना
जिस ने सिखाया था वह मेरी शिक्षिका थी..
मां का प्यार और पिता की डांट तो अक्षर खूब मिला करती थी
पर प्यार से डांट जिसकी मिलती थी वह मेरी शिक्षिका थी

मेरी शिक्षिका मेरी शिक्षिका नहीं निष्पक्ष पिता-सी थी

सच्ची सहेली की तरह सही गलत की राय देने वाली..
लड़की हूं हजार विकट घड़ियों में जिसने रास्ता दिखाया वह मेरी शिक्षिका थी..
कल्चरल प्रोग्राम की देर समाप्ति पर जब तक मां नहीं आई तब तक जो हाथ थामे खड़ी थी वह मेरी शिक्षिका थी..
जौहरी की तरह परख कर मेरे हुनर को हीरे के रूप में तराश कर जो दुनिया के सामने लाई थी वह मेरी शिक्षिका थी
मेरी प्रस्तुतीकरण पर तालियों की गड़गड़ाहट में मेरे उज्जवल भविष्य का जो उद्घोष लेकर खड़ी थी वह मेरी शिक्षिका थी
एक इंसान एक रिश्ता निभाता है जिसने हर रिश्ता बखूबी निभाया मेरी शिक्षिका थी

माना अभी तक पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई लेकिन बार-बार उठने की कोशिश करते रहना जिस ने सिखाया था वह मेरी शिक्षिका थी

मेरी शिक्षिका मात्र शिक्षिका नहीं मेरी जिंदगी की सफलताओं की कुंजी थी


*मेरी जिंदगी से जुड़ी हर शिक्षिका-शिक्षक को शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं*


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