Thursday, October 15, 2020

अंतिम पेपर का अंतिम सवाल (स्वरचित कविता)


जीत लेने को,गढ़ का सुरूर,
अब बस कुछ कदम दूर,
आजादी के जश्न का गुरूर,
सामने है बस एक अंतिम दस्तूरl

अंतिम पेपर का अंतिम सवाल...

खिड़की से झांकता,खेलते दोस्तों को,
आंखें फेर लेता,देख चलते टेलीविजन को,
मन को बहलाता,कुछ दिन और है पढ़ने को,
उंगलियों पर गिनता,घटते दिन परीक्षा कोl

अंतिम पेपर का अंतिम सवाल...

कल्पना उठती हजारों मन में,
निरंतर उत्साह बढ़ता तन में,
खूब मजे करूंगा छुट्टियों में,
उमंग से पढ़ता,इसी सोच मेंl

अंतिम पेपर का अंतिम सवाल...

आज सामने है खूबसूरत जाल,
बड़ी उमंग से देख मेरा कमाल,
चंद पल रहे हैं मचाने को धमाल,
क्योंकि आ गया है...
अंतिम पेपर का अंतिम सवालl



मींरा (1498-1573 ईसवी)


*मीराबाई
(1498-1573) सोलहवीं शताब्दी की एक कृष्ण भक्त और कवयित्री थीं।

*उनकी कविता कृष्ण भक्ति के रंग में रंग कर और गहरी हो जाती है।

*मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है।

*मीरा कृष्ण की भक्त हैं।

*मीराबाई का जन्म पाली के कुड़की गांव में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ।

*ये बचपन से ही कृष्ण भक्ति में रुचि लेने लगी थीं।

*मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ।

* उदयपुर के महाराजा भोजराज इनके पति थे जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे।

*विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गयाl

* वे विरक्त हो गई और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगी।

*पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई।

*ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थी। 
*मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा।

*उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की।

*घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गई।

*वह जहाँ जाती थी,वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था।

*लोग उन्हे देवी के जैसा प्यार और सम्मान देते थे।

*मीरा का समय बहुत बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल का समय रहा है।

*बाबर का हिंदुस्तान पर हमला और प्रसिद्ध खानवा का युद्ध उसी समय हुआ था।

*इस सभी परिस्तिथियों के बीच मीरा का रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धत्ति सर्वमान्य  बनी।

* मीराबाई की रचनाएं

- नरसी जी रो मायरो
- गीत गोविंद की टीका
राग गोविंद
- राग सोरठ
- राग विहाग

*मीरा की भक्ति माधुरी दांपत्य भाव की मानी जाती है

* मीरा का बचपन का नाम पेमल था

* मीरा के पदों को उनकी सहेली ललिता ने लिपिबद्ध किया

* सुमित्रानंदन पंत ने मीरा की भक्ति के तपोवन की शकुंतला और मरुधर की मंदाकिनी कहा है

* मीरा के गुरु रैदास थेl

Tuesday, October 13, 2020

पहली पोस्टिंग का एहसास (स्वरचित कविता)


कभी सोचा ना था,
ऐसा दिन भी आएगा..
यह पहली पोस्टिंग का एहसास था
जो कहीं और ले कर जाएगाl

कुछ समझ ना पाई,
कुछ संभल ना पाई,
उस दिन कुछ ऐसे ही
विश्वास ना कर पाईl

जानती तो सब कुछ थी,
पर कल्पना नहीं की थी,
अपने गांव को ही अपना
निश्चित कोना मान चुकी थीl

यह मेरी जिंदगी की पहली उड़ान थी,
आशातीत आकाश खुला था
बस मैं उड़ना नहीं जानती थी
लेकिन उस दिन फड़फड़ा लेना चाहती थीl

जिंदगी में पहली बार बाहर निकली थी,
हर परिवर्तन में ढल जाना चाहती थी,
हर खुशी को अपना बना लेना चाहती थी,
जी हां मैं अपने पति की पहली पोस्टिंग को यादगार बना लेना चाहती थीl

नया शहर,नए लोग,
नई दुकानें तो नए मंदिर,
बस देखते ही देखते जिंदगी से जुड़ते गए
लगा जैसे उनको मेरी राह में बरसों बीत गएl

हर पल जो फिसलता जा रहा था,
उसे रोक लेना चाहती थीl
हर क्षण जो बिखरता जा रहा था,
उसे सिमेट लेना चाहती थीl
हर चीज जिसमे परायापन था,
उसे अपना बना लेना चाहती थीl
किराए के घर की अनजान गली में
खूबसूरत सफर जी लेना चाहती थीl

कभी सोचा ना था,
जिंदगी का ऐसा अध्याय खुलेगा..
यह पहली पोस्टिंग का एहसास था
जो इतनी खुशियां लाएगा...

आरम्भ हैं प्रचण्ड...

आरम्भ है प्रचण्ड, बोले मस्तकों के झुंड आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो आन बान शान या कि जान का हो दान आज इक धनुष के बाण पे उतार दो आरम्भ है प...