Thursday, October 15, 2020

मींरा (1498-1573 ईसवी)


*मीराबाई
(1498-1573) सोलहवीं शताब्दी की एक कृष्ण भक्त और कवयित्री थीं।

*उनकी कविता कृष्ण भक्ति के रंग में रंग कर और गहरी हो जाती है।

*मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है।

*मीरा कृष्ण की भक्त हैं।

*मीराबाई का जन्म पाली के कुड़की गांव में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ।

*ये बचपन से ही कृष्ण भक्ति में रुचि लेने लगी थीं।

*मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ।

* उदयपुर के महाराजा भोजराज इनके पति थे जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे।

*विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गयाl

* वे विरक्त हो गई और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगी।

*पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई।

*ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थी। 
*मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा।

*उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की।

*घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गई।

*वह जहाँ जाती थी,वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था।

*लोग उन्हे देवी के जैसा प्यार और सम्मान देते थे।

*मीरा का समय बहुत बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल का समय रहा है।

*बाबर का हिंदुस्तान पर हमला और प्रसिद्ध खानवा का युद्ध उसी समय हुआ था।

*इस सभी परिस्तिथियों के बीच मीरा का रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धत्ति सर्वमान्य  बनी।

* मीराबाई की रचनाएं

- नरसी जी रो मायरो
- गीत गोविंद की टीका
राग गोविंद
- राग सोरठ
- राग विहाग

*मीरा की भक्ति माधुरी दांपत्य भाव की मानी जाती है

* मीरा का बचपन का नाम पेमल था

* मीरा के पदों को उनकी सहेली ललिता ने लिपिबद्ध किया

* सुमित्रानंदन पंत ने मीरा की भक्ति के तपोवन की शकुंतला और मरुधर की मंदाकिनी कहा है

* मीरा के गुरु रैदास थेl

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