आलम ब्रजभाषा के प्रमुख मुसलमान कवियों में से एक हैं। कहते हैं ये जन्म के ब्राह्मण थे। एक बार शेख नाम की रंगरेजिन को इनकी पगडी में एक आधा दोहा बँधा मिला,
'कनक छडी सी कामिनी, काहे को कटि छीन,
जिसकी उसने पूर्ति की,
'कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन।
इस पर रीझकर आलम मुसलमान हो गए और उससे निकाह कर लिया। तब से दोनों शेख या आलम के नाम से कविता करने लगे। इनके पुत्र का नाम 'जहान था।
एक बार औरंगजेब के पुत्र मुआलम जो बाद में बहादुर शाह के नाम से गद्दी पर बैठे थे.... ने शेख से मजाक किया, सुना है आप आलम की बीवी हैं, उसने फौरन कहा, जहाँपनाह 'जहान की माँ मैं ही हूँ।
आलम के तीन ग्रंथ हैं- 'माधवानल-काम-कंदला, 'श्याम-सनेही तथा 'आलम-केलि। 'आलम केलि इनके श्रेष्ठ मुक्तकों का संग्रह है।

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