Saturday, August 29, 2020

वो बारिश की पहली बूंद (स्वरचित कविता)


वो बारिश की पहली बूंद,
अंतिम रात में आंखें मूंद,
सच करने को अपना सपना
सूरज का रास्ता ताकती होगीl

वो बारिश की पहली बूंद..

जानती तो वो सब कुछ होगी
फिर भी अनजान बनती होगी..
मंजिल से पहले ही धरती की
तपन में हस्ती मुझे खोनी होंगी..
जब जीवन ही मरण के लिए है तो
मरण का यही रास्ता चुनती होगी..
खुद को जलाकर अनुचर झड़ी
सखियों का रास्ता शीतल करती होगी

वो बारिश की पहली बूंद..

कुछ कर सके या ना कर
सके पर बहुत कुछ कर देगी..
इस दृढ़ विश्वास के साथ
अपना सामान बांधती होगी..
जब एक चिंगारी आग लगा दे तो
वो बूंद भी मेरी जैसी होगी..
जो महासागर बनाती होगी
रंगहीन होकर भी धरती
को रंगीन बना देगी
इसी उमंग में इंद्रधनुष के सारे रंगों से
रगड़ रगड़ कर वो नहाती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..

करोड़ों लोग मेरी एक झलक पाने को आतुर
यह सोच खुद को कितना सजाती होगी
गर्म लू के झोंके कहीं नजर ना लगा दे मुझे
सोच कर खुद को काजल का टीका लगाती होंगी
आह!मई जून की अंगारों सी धरती
को कितनी जरूरत मेरी होगी..
ऐसा सोच कर अपना पहला
कदम वो भरती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..
अंतिम रात में आंखें मूंद..
अपने इसी त्याग और बलिदान
की कविता सुनाने...
सूरज का रास्ता तकती होगी...

वो बारिश की पहली बूंद...

6 comments:

  1. दिल छू लिया है बहुत ख़ास सुदंर

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  2. प्रेरक कविता, पहला कदम बहुत महत्वपूर्ण होता है

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