Friday, September 11, 2020

आज दादा जी का श्राद्ध था (स्वरचित कविता)


सुबह जल्दी उठने का दिन था
खीर पुरी बनाने का नियम था
चल रहा उस वक्त पितृपक्ष था
और आज दादा जी का श्राद्ध था

मेरा बेटा भी उठ गया,मेरे साथ था
क्या कर रही हो यह उसका सवाल था
श्राद्ध उसे समझाना मेरा मंतव्य था
पुश्तैनी रीति रिवाज उसे सौंपना कर्तव्य था
आज दादा जी का श्राद्ध था....

जो चले जाते हैं दुनिया से,
कौवा बन मिलने आते हैं अपनों से,
तर्पण होता है उनकी पसंदीदा व्यंजन से,
श्राद्ध होता है बस श्रद्धा से,

मम्मा प्यार तो मैं भी करता हूं आप से,
मैं क्या रखूं आपके लिए पूछा उसने धीरे से,
सुनकर मुस्कुरा पड़ी मैं खुशी से,
जीते जी मिल गया हर तर्पण उन कोमल शब्दों से,

मासूमियत से उसने कुछ कहा था..
असल में कुछ में सब कुछ कह दिया था..
चल उस वक्त पित्र पक्ष था
और आज दादाजी का श्राद्ध थाll


1 comment:

आरम्भ हैं प्रचण्ड...

आरम्भ है प्रचण्ड, बोले मस्तकों के झुंड आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो आन बान शान या कि जान का हो दान आज इक धनुष के बाण पे उतार दो आरम्भ है प...