Monday, September 14, 2020

मेरे पति का दफ्तर (स्वरचित कविता)


यह वही इमारत है
जिसकी आधी वफादार मैं हूंl
जगती हूं हर रोज जल्दी
तो देर यहां नहीं होती है
बड़ा ही विचित्र लगाव है
मेरे पति का इस दफ्तर से..
जुड़े थे मेरे लिए इस दफ्तर से..
आज मेरा नंबर इसके बाद लगता हैl
...........मेरे पति का दफ्तर

यह वही मंदिर है
जिसकी आधी पुजारिन मैं हूंl
करती हूं घर से हर रोज दीया
तो ज्योत यहां जगती है
बड़ा ही विचित्र रिश्ता हैं
मेरा इस दफ्तर से..
जब ज्योत यहां जगती हैं
तो वहां मेरे घर का चूल्हा जगता है
..........मेरे पति का दफ्तर

यह वही रणभूमि है
जिसकी आधी वीरांगना मैं हूंl
सोती नहीं मैं आधी रातों तब
जब तक यह जगता है
बड़ा ही विचित्र सौदा है
हमारा इस दफ्तर से...
युवावस्था का स्वर्णिम काल लेकर
बुढ़ापा कोहिनूर बनाता है
..........मेरे पति का दफ्तर

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