Saturday, August 22, 2020

मैंने भगवान देखा है (स्वरचित कविता)


कौन कहता है भगवान नहीं होता,
मैंने देखा है भगवान
अपनी आंखों से देखा है भगवान
मन से महसूस किया है मैंने भगवानl

अपने ही सामने अपनी मां को खोते देखा है,
भगवान को मेरी मां बनते देखा है
दुर्भाग्य को भाग्य में बदलते देखा है
हां,दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

जब सोती हूं,चैन से..
रात मे चुपके से उनका आना,
मुझे ढंग से ओढा कर जानाl

वह भगवान नहीं तो और कौन है?

जब मैं देर तक नहीं जगती तो,
मेरे कमरे का दरवाजा बार-बार बंद करना..
मैं देर से उठू इसे लेकर,
दूसरों को नाराज ना होने देना..

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए अपने खाने का हिस्सा बचाना
दाल में दो-दो बार घी डालना
मेरे खाने के लिए मेरे पीछे-पीछे घूमनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए दुनिया से लड़ना
दुनिया के लिए मुझसे बनावटी झगड़ना
गुस्से में भी प्यार झलकानाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

पहले उनका मुझे डांटना,
फिर प्यार से माफी मांगना,
सारा गुनाह खुद का ही कबूल लेनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरी मुसीबत के सामने दीवार बनकर डट जाना,
मेरी खुशियों के लिए मॉम बनकर पिघल जाना,
मुझे औरों के सामने
अच्छा बनाने के लिए खुद को बुरा बना देनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

और यदि वो भगवान है तो ...
मेरे लिए वो मेरी दादी मां नहीं तो और कौन है?

कौन कहता है भगवान नहीं होता?

मैंने देखा है मेरी दादी मां में मेरा भगवान,
भाग्य से ही सही
लेकिन मैंने भगवान देखा है..

सच है दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

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