Saturday, August 22, 2020

मैं एक अनाथ (स्वरचित कविता)




जब उम्र थी तेरी
बना दिया तूने मुझे मांl
बस एक ही तो जिम्मेदारी थी,मेरी
क्या उसे भी तू ना निभापाइ मां!

जब उम्र थी हठ करने की मेरी
तू हठी बन गई मां,
खुद को ही बहलाता रहा,फुसलाता रहा
पर तू कहीं नजर नहीं आई मां!

जब उम्र थी मेरी,थामकर उंगली
चलने की तेरी
थमा दी छोटी-छोटी उंगलियां
खुद को ही मैंने मां!
नहीं था फैसला इस धरती पर आने का मेरा
नौ महीने कोख में रखकर
तू ही तो लाई थी ना मां!

जब उम्र थी,तेरे आंचल को ओढ़ने की मेरी,
जलता रहा तपती धूप में
सिर से नंगे पावों तक मेरी मां!
दर-दर भटकता,खोजता रहा हर पल..
छम छम करती दूर कहीं से तू आ जाए मां!

जब उम्र थी तुझसे लिपटकर रोने की मेरी
पोछती रही,आंखें
ये नन्हीं हथेलियां देर तक मेरी मां!
मां तो अपना बनाती है,
पर क्यों हुआ मैं उसी से पराया
ऐसा क्या हुआ,
जो ममता के बदले सजा मिली मुझे मां!

जानता हूं तू भी मुझे याद करती है ना मां!
तो क्यों नहीं आती,सामने तू मेरे मां,
प्यार नहीं तो नफरत ही सही
कुछ तो तेरा दे दे मां!
जिंदगी के इस उतराव में,
एक बार तेरी गोदी चढ़ने दे मां!

जब उम्र थी अच्छा बनाने की मुझे मां!
क्यों पहले ही बुरा बनकर तुझ गया मैं मां,
आज भी जिंदा है तेरे रूप में मेरा नाथ
फिर भी क्यों रह गया "मैं एक अनाथ"l

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