Friday, August 21, 2020

चतुर चितेरा (स्वरचित कविता)


इस जग का चित्र बड़ा निराला है,
कहीं खुशियां तो कहीं दुखियाला है,
कहीं अंधेरा तो कहीं उजियारा है,
कहीं कांटे तो कहीं फुलवारी है,
कहीं निराशा तो कहीं खुशहाली है,
कहीं पतझड़ तो कहीं हरियाली हैl

इस जग को ना जाने किसने बनाया है
अवश्य वह रंग भरने वाला चतुर चितेरा है
जिसने सतरंगी जहां रचाया है
एक रंग को भी ना पीछे छोड़ा है
सारे रंगों को अपने आंचल में छुपाया है
एक एक को सारे रंग दिखलाता हैl

बड़ी बारीकी से अपना काम करता है
लंबे समय तक एक को ना एक रंग पहनाता है
पर इंसान एक रंग को अपना रंग मान बैठता है
सारे रंगों से मिलकर खुशियों का रंग बनता है
रंगो के इस खेल में इंसान अभी अंजाना है
इस कारण इंसान रंगों की बाजी शीघ्र हार जाता हैl

तूने हजारों बार इंसान को उलझाया है
'एक रंग से दूसरा रंग बनता है'
हर रंग के बाद एक नया रंग आता है
रंगों के इस मैदान में तूने बहुत दौड़ाया हैl

भूल गया मुझे भी तो तूने बनाया है
रंगो की पहचान में ये मन अभी ना हारा है
रंगों की इस कशमकश को आज जीत पाया है
ये विभिन्न रंग नहीं मात्र आंखों का धोखा हैl

यही रंगों का राज आज तक कोई न जान पाया है
अभी भी एक सवाल मन मचलाता है
हे चतुर चितेरे!तू किस रंगीन मिट्टी से बना है
बता 'तुझे किसने बनाया है'l

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