Friday, March 19, 2021

शेख-आलम


आलम ब्रजभाषा के प्रमुख मुसलमान कवियों में से एक हैं। कहते हैं ये जन्म के ब्राह्मण थे। एक बार शेख नाम की रंगरेजिन को इनकी पगडी में एक आधा दोहा बँधा मिला,


'कनक छडी सी कामिनी, काहे को कटि छीन, 

जिसकी उसने पूर्ति की, 

'कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन। 

इस पर रीझकर आलम मुसलमान हो गए और उससे निकाह कर लिया। तब से दोनों शेख या आलम के नाम से कविता करने लगे। इनके पुत्र का नाम 'जहान था।

एक बार औरंगजेब के पुत्र मुआलम जो बाद में बहादुर शाह के नाम से गद्दी पर बैठे थे.... ने शेख से मजाक किया, सुना है आप आलम की बीवी हैं, उसने फौरन कहा, जहाँपनाह 'जहान की माँ मैं ही हूँ।

आलम के तीन ग्रंथ हैं- 'माधवानल-काम-कंदला, 'श्याम-सनेही तथा 'आलम-केलि। 'आलम केलि इनके श्रेष्ठ मुक्तकों का संग्रह है।

Wednesday, March 17, 2021

# हकीकत

हकीकत रूबरू हो तो अदाकारी नहीं चलती खुदा के सामने बंदों की मक्कारी नहीं चलती तुम्हारा दबदबा खाली तुम्हारी जिंदगी तक है किसी की कब्र के अंदर जमीदारी नहीं चलती...
-  अज्ञात

Friday, March 5, 2021

#खूबसूरत पंक्तियां

"तुम्हें अगर शौक है बिजलियां गिराने का
 तो हमारा काम भी है आशियां बनाने का
सुना है आप हैं माहिर  हवा चलाने में
 तो हम भी हुनर निचोड़ेंगे दीया जलाने का"       - अज्ञात

#खूबसूरत पंक्तियां: हौसला

"परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन उनके पर बोलते हैं अक्सर भी लोग खामोश रहते हैं जिनके हुनर बोलते हैं" - अज्ञात

आरम्भ हैं प्रचण्ड...

आरम्भ है प्रचण्ड, बोले मस्तकों के झुंड आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो आन बान शान या कि जान का हो दान आज इक धनुष के बाण पे उतार दो आरम्भ है प...