Sunday, September 27, 2020

अपनी हिंदी( स्वरचित कविता)


"बहुत ही मीठी है अपनी हिंदी

कहीं इसका स्वाद खट्टा ना हो जाए,

बहुत ही सुंदर है अपनी हिंदी

कहीं इसका श्रृंगार कम ना पड़ जाए,

बड़ी सरल है अपनी हिंदी

कहीं कठिनाइयों में उलझ ना जाए,

नाज़ हैं अपना ताज है अपना हिंदी

कहीं इसके सम्मान में कमी ना हो जाए,

एक शब्द के अनेक अर्थ

अनेक शब्दों का एक अर्थ

बड़ा ही विचित्र भंडार रखती है मेरी हिंदी

कहीं इसकी संपन्नता कम ना हो जाए,

जागो उठो परचम लहराओ

हिंदी के गौरव में कहीं कमी ना रह जाए,

उन्नति का आसमान छुए अपनी हिंदी

कहीं अपना कदम छोटा ना पड़ जाए।"

( स्वरचित)

***

अधूरा है संसार बिना बेटियां (स्वरचित कविता)


रात के अंधेरे में जुगनू-सी है बेटियां,
शबनम पर ओस की बूंद-सी है बेटियां,
दिन की तपन में शीतल छाया-सी है बेटियां,
पराई होकर भी अपनी है बेटियां।

निराशा में आशा की किरण है बेटियां,
चार दीवारों के सन्नाटे में मधुर स्वर है बेटियां,
रिश्तो की बागडोर मे रेशम है बेटियां,
पराया को अपना मान सकती हैं सिर्फ बेटियां।

रुलाती है तो हंसाती भी है बेटियां,
चिढ़ाती है तो मनाती भी हैं बेटियां,
हर त्योहार की प्रति छाया है बेटियां,
संस्कार की परिभाषा है बेटियां,

हर जख्म की मरहम है बेटियां,
हर दवा में दुआ है बेटियां,
हर गम को,
कम करने की ताकत है बेटियां
कैसी हो मां पूछ कर,
हर दर्द मिटा देती हैं बेटियां।

हर गीत का सूर है बेटियां,
हर नाच की ताल है बेटियां,
हर जीत का जश्न है बेटियां,
हर कला की शैली है बेटियां।


समाज की अभद्रता से दूर हैं बेटियां,
जगत के कुरूपता में हूर है बेटियां,
सोलह श्रृंगार का असली नूर है बेटियां
परिवार के मान-सम्मान की गुरुर है बेटियां,

पिता का ताज है बेटियां,
मां का नाज है बेटियां,
भाई की कलाई की शान है बेटियां
घर वहीं जहां बहू बन जाती है बेटियां

सच में अधूरा है संसार बिना बेटियां।

***
27 सितंबर 2020
राष्ट्रीय बेटी दिवस
(भारत)

Monday, September 14, 2020

मेरे पति का दफ्तर (स्वरचित कविता)


यह वही इमारत है
जिसकी आधी वफादार मैं हूंl
जगती हूं हर रोज जल्दी
तो देर यहां नहीं होती है
बड़ा ही विचित्र लगाव है
मेरे पति का इस दफ्तर से..
जुड़े थे मेरे लिए इस दफ्तर से..
आज मेरा नंबर इसके बाद लगता हैl
...........मेरे पति का दफ्तर

यह वही मंदिर है
जिसकी आधी पुजारिन मैं हूंl
करती हूं घर से हर रोज दीया
तो ज्योत यहां जगती है
बड़ा ही विचित्र रिश्ता हैं
मेरा इस दफ्तर से..
जब ज्योत यहां जगती हैं
तो वहां मेरे घर का चूल्हा जगता है
..........मेरे पति का दफ्तर

यह वही रणभूमि है
जिसकी आधी वीरांगना मैं हूंl
सोती नहीं मैं आधी रातों तब
जब तक यह जगता है
बड़ा ही विचित्र सौदा है
हमारा इस दफ्तर से...
युवावस्था का स्वर्णिम काल लेकर
बुढ़ापा कोहिनूर बनाता है
..........मेरे पति का दफ्तर

14 सितंबर 'हिंदी दिवस'




"मजहब नहीं सिखाता,आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम,वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा"

मोहम्मद इकबाल साहब की इन पंक्तियों पर हमें गर्व होना चाहिए कि हम इतनी बड़ी आबादी वाले  देश हिंदुस्तान के रहने वाले हैं और भाषा ही हमारी पहचान है
 
"पग पग पर बदले  पानी
पग पग पर बदले वाणी..."
 
 "विविधता में एकता भारत की विशेषता"

भले ही हिंदुस्तान विभिन्न बोलियों के मोतियों की माला वाला देश रहा है लेकिन इस हिंदुस्तान की माला का धागा हमेशा हिंदी ही रहा है..

आज 14 सितंबर संपूर्ण भारत में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है...

कहा जाता है 'व्यौहार राजेन्द्र सिंहा' का जन्म दिवस आज के दिन पड़ता हैl उनका अमूल्य योगदान रहा है हिंदी के विकास में... उनकी ही याद में हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता हैl

*आज से 43 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में बोलने का फैसला किया...वे उस समय मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री थे... सन 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का 32वां सत्र था...संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका पहला संबोधन था और उन्होंने अपनी बात हिंदी में कहने का फैसला किया।

गर्व है हमें राष्ट्र के इन नेताओं पर।

*प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र में हिंदी भाषा में संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में वैश्विक चुनौतियों के साथ भारत की उपलब्धियों को भी रेखांकित किया। 

*प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र में संबोधित कर चुके हैं। वह देश के लिए सम्मान और गौरव के क्षण थे।

*इससे पहले बीते वर्ष देश के सम्मान में उस समय और अधिक इजाफा हुआ था जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया और हिंदी भाषा में ही पहला ट्वीट किया। पहले ट्वीट में लिखा संदेश पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने फेसबुक पर भी हिंदी पेज बनाया है।



हिंदी की बिंदी की माध्यम से मेरा एक प्रयास है हिंदी को बढ़ावा देनाl
हमारी भाषा ही हमारी पहचान है और अपनी पहचान को एक नया स्तर तक पहुंचाना.. मैं अपना कर्तव्य समझती हूं।

*हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है।

*14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी।

*इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

*एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंहा का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया ।

*स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालकेलकर मैथिलीशरण गुप्त हजारी प्रसाद द्विवेदी सेठ गोविंद दास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंहा ने अथक प्रयास किए।

*मुझे मेरी भाषा हिंदी पर गर्व है क्योंकि मेरी हिंदी का प्रथम वर्ण 'अ' से अज्ञ से शुरु होकर 'ज्ञ' से ज्ञान तब लेकर जाता है।

*भारत की नागरिक होने के नाते मुझे आज गर्व है कि मैंने मेरी ब्लॉग की शुरुआत हिंदी में ही की..
मैं गूगल की आभारी हूं क्योंकि उन्होंने ब्लॉक में हिंदी भाषा की टाइपिंग को जोड़ा।

*सन्1918 में गांधीजी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था।

*14 सितम्बर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की अनुच्छेद 343(1) में इस प्रकार वर्णित है:

*संघ की राष्ट्रभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।

 *बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद हिन्दी भाषा पूरे दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भाषा है।
-लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है।

इस कारण ऐसे लोग जो हिन्दी का ज्ञान रखते हैं या हिन्दी भाषा जानते हैं, उन्हें हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है

जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिन्दी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें।

-लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखती है।हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है।

*इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता?

* हिंदी की बिंदी मेरा पहला कदम है।

* गर्व इस बात पर नहीं कि कहां तक जाएगा जबकि इस बात पर है कि बढ़ रहे पाश्चात्यकरण की स्थिति में मेरा यह कदम एक हिंदुस्तानी की आत्मा का प्रतिदर्शी होगा।

Friday, September 11, 2020

आज दादा जी का श्राद्ध था (स्वरचित कविता)


सुबह जल्दी उठने का दिन था
खीर पुरी बनाने का नियम था
चल रहा उस वक्त पितृपक्ष था
और आज दादा जी का श्राद्ध था

मेरा बेटा भी उठ गया,मेरे साथ था
क्या कर रही हो यह उसका सवाल था
श्राद्ध उसे समझाना मेरा मंतव्य था
पुश्तैनी रीति रिवाज उसे सौंपना कर्तव्य था
आज दादा जी का श्राद्ध था....

जो चले जाते हैं दुनिया से,
कौवा बन मिलने आते हैं अपनों से,
तर्पण होता है उनकी पसंदीदा व्यंजन से,
श्राद्ध होता है बस श्रद्धा से,

मम्मा प्यार तो मैं भी करता हूं आप से,
मैं क्या रखूं आपके लिए पूछा उसने धीरे से,
सुनकर मुस्कुरा पड़ी मैं खुशी से,
जीते जी मिल गया हर तर्पण उन कोमल शब्दों से,

मासूमियत से उसने कुछ कहा था..
असल में कुछ में सब कुछ कह दिया था..
चल उस वक्त पित्र पक्ष था
और आज दादाजी का श्राद्ध थाll


Saturday, September 5, 2020

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त


मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता काशी बाई की तीसरी संतान के रूप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ।

प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग" तथा बाद में "जयद्रथ वध" प्रकाशित हुई। उन्होंने  बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध", "ब्रजांगना" का अनुवाद भी किया। सन् 1912 - 1913 ई. में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत  "भारतभारती' का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई।


*महाकाव्य- साकेत, यशोधर

*खण्डकाव्य- जयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल , जय भारत, युद्ध, झंकार , पृथ्वीपुत्र, वक संहार

 *शकुंतला, विश्व वेदना, राजा प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला, प्रदक्षिणा, दिवोदास भूमि-भाग

*नाटक - रंग में भंग , राजा-प्रजा, वन वैभव , विकट भट , विरहिणी , वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री  स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा , हिन्दू, चंद्रहास

Friday, September 4, 2020

वह मेरी शिक्षिका थी (स्वरचित कविता)


बचपन में मां जिसके भरोसे मुझे स्कूल छोड़कर निश्चिंत लौट जाया करती थी..
मां की याद में जिसका आंचल मे सिसका करती थी..
पानी की बोतल और टिफिन का ढक्कन जिसने खोलना सिखाया..वह मेरी शिक्षिका थी
दिन को रात भी अगर जिसने कह दिया उस पर भी विश्वास करने वाला अंधविश्वास जिसका था वह मेरी पहली शिक्षिका थी..

मेरी प्राइमरी शिक्षिका शिक्षिका नहीं मेरी दूसरी मां-सी थी

ज्ञान तो किताबों में भी पड़ा है जो व्यावहारिक ज्ञान दिया करती थी...
सैद्धांतिक तरीके से उठना बैठना आना-जाना
जिस ने सिखाया था वह मेरी शिक्षिका थी..
मां का प्यार और पिता की डांट तो अक्षर खूब मिला करती थी
पर प्यार से डांट जिसकी मिलती थी वह मेरी शिक्षिका थी

मेरी शिक्षिका मेरी शिक्षिका नहीं निष्पक्ष पिता-सी थी

सच्ची सहेली की तरह सही गलत की राय देने वाली..
लड़की हूं हजार विकट घड़ियों में जिसने रास्ता दिखाया वह मेरी शिक्षिका थी..
कल्चरल प्रोग्राम की देर समाप्ति पर जब तक मां नहीं आई तब तक जो हाथ थामे खड़ी थी वह मेरी शिक्षिका थी..
जौहरी की तरह परख कर मेरे हुनर को हीरे के रूप में तराश कर जो दुनिया के सामने लाई थी वह मेरी शिक्षिका थी
मेरी प्रस्तुतीकरण पर तालियों की गड़गड़ाहट में मेरे उज्जवल भविष्य का जो उद्घोष लेकर खड़ी थी वह मेरी शिक्षिका थी
एक इंसान एक रिश्ता निभाता है जिसने हर रिश्ता बखूबी निभाया मेरी शिक्षिका थी

माना अभी तक पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई लेकिन बार-बार उठने की कोशिश करते रहना जिस ने सिखाया था वह मेरी शिक्षिका थी

मेरी शिक्षिका मात्र शिक्षिका नहीं मेरी जिंदगी की सफलताओं की कुंजी थी


*मेरी जिंदगी से जुड़ी हर शिक्षिका-शिक्षक को शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं*


Monday, August 31, 2020

मेरे स्कूल के दिन (स्वरचित कविता)


मेरे स्कूल के दिन...
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

मेरे स्कूल के दिन..

खिड़की के पर्दे से झांक रही हल्की रोशनी मे उठा करते थे
सीपी सी अध खुली आंखों से ही नहा लिया करते थे,
चटकीली नीली गगरी उस पर सफेद कमीज
पहन कहर ढाया करते थे,
लाल रिबन से दो चोटियों बांध घंटों शीशे के सामने खुद को संवारा करते थेl

आहा!मेरे स्कूल के दिन...

आज लंच बॉक्स में क्या है?मां जैसे सवाल
तो दिनचर्या के हिस्से हुआ करते थे,
घंटों रगड़ कर काले जूतों को भी सफेदी सा चमका दिया करते थे,
झुलते मौजों में रबड़ बांध उनमें जान फूंक दिया करते थे,
भले कबाड़ से जुगाड़ हो पर कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं किया करते थे,


मेरे स्कूल के दिन...

सुबह की घनघोर घटाओं से प्यारी चिड़िया की चहचहाहट हुआ करती थी,
उससे भी प्यारी दूर कहीं से आती हुई स्कूल की घंटी की आवाज हुआ करती थी,
पीटीआई मैडम के डर से मिनटों में सफर पैदल ही तय कर लिया करती थी,
रास्ते में हर बूढ़े इंसान से जय राम जी की काकी कह कर सारे रिश्तो के बीज बिखेरा करती थी,

मेरे स्कूल के दिन..

24 घंटों मे चंद पलों की प्रार्थना में न जाने आंखें खोलकर क्या राज देखा करती थी,
खुद की गलती ना पकड़े जाने पर अक्सर गढ़ जीत लिया करती थी,
सोमवार से आखिरी दिन तक यूनिफॉर्म को हथेली के छाले की तरह रखा करती थी,
क्योंकि उस वक्त इस्त्री सप्ताह में 1 दिन ही हुआ करती थी,
स्वच्छता अनुक्रमाणिका से लेकर सर्वश्रेष्ठ की अंक तालिका तक अक्सर में छाए रहा करती थी,
स्कूल की बाई जी मुझे लाडली कह कर पुकारा करती थी,
हर अध्यापक की में चहेती हुआ करती थी

मेरे स्कूल के दिन...

इंटरवल को हम रेसिस बोला करती थी,
पावलव थ्योरी के अनुसार न जाने क्यों रेसिस की घंटी बजने से ही तेज भूख लग जाया करती थी,
इंटरवल के आधे घंटे में जिंदगी की सारी हंसी खेल खेल लिया करती थी,
पर भाग्य से मेरी पकड़ने की बारी आती ही इंटरवेल की घंटी बज जाया करती थीl

मेरे स्कूल के दिन..

गणितीय सूत्र हो या रसायन सूत्र ट्रिक बनाकर
तोते की तरह ही रख लिया करती थी,
पर सामाजिक इतिहास के लंबे-लंबे पन्ने गिन कर ही घबरा जाया करती थी,
SUPW कैंप की तो बात ही क्या!
360 दिनों के बंदिश की भड़ास उन 5 दिनों की आजादी के जश्न में निकाल दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हमारी कक्षा प्रिंसिपल ऑफिस के पास लगा करती थी,
क्योंकि हम बदमाशी में भी अव्वल रहा करती थी,
बिन बातें हम सहेलियां घंटों बतलाया करती थी,
मुंह पर अंगुली रखने वाली सजा में दूसरी उंगली से स्लेट पर लिख लिख कर बातें किया करती थी..
वैकल्पिक प्रश्न पत्र तो हम इशारों में ही पूरे कर लिया करती थी,
एक नंबर गलत कट जाने पर अध्यापक से घंटों लड़ा करती थी,
और एक नंबर अतिरिक्त मिल जाने पर आईआईटी की डिग्री ही जीत लिया करती थी,
खुद से ज्यादा आरामदायक जगह तो अपने बैग को दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हम स्कूल को विद्या मंदिर कहा करती थी,
दोस्तों हम मां सरस्वती की सौगंध पर ही पूरा सच उगल लिया करती थी,
इन छोटी-छोटी बर्फ के टुकड़ों सी खुशियों से ही हम आनंद का हिमालय खड़ा कर लिया करती थी,
जी हां! हम तितलियों की तरह अपने गुलिस्ता की महारानियां कहलाया करती थी

मेरे स्कूल के दिन..
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

Saturday, August 29, 2020

वो बारिश की पहली बूंद (स्वरचित कविता)


वो बारिश की पहली बूंद,
अंतिम रात में आंखें मूंद,
सच करने को अपना सपना
सूरज का रास्ता ताकती होगीl

वो बारिश की पहली बूंद..

जानती तो वो सब कुछ होगी
फिर भी अनजान बनती होगी..
मंजिल से पहले ही धरती की
तपन में हस्ती मुझे खोनी होंगी..
जब जीवन ही मरण के लिए है तो
मरण का यही रास्ता चुनती होगी..
खुद को जलाकर अनुचर झड़ी
सखियों का रास्ता शीतल करती होगी

वो बारिश की पहली बूंद..

कुछ कर सके या ना कर
सके पर बहुत कुछ कर देगी..
इस दृढ़ विश्वास के साथ
अपना सामान बांधती होगी..
जब एक चिंगारी आग लगा दे तो
वो बूंद भी मेरी जैसी होगी..
जो महासागर बनाती होगी
रंगहीन होकर भी धरती
को रंगीन बना देगी
इसी उमंग में इंद्रधनुष के सारे रंगों से
रगड़ रगड़ कर वो नहाती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..

करोड़ों लोग मेरी एक झलक पाने को आतुर
यह सोच खुद को कितना सजाती होगी
गर्म लू के झोंके कहीं नजर ना लगा दे मुझे
सोच कर खुद को काजल का टीका लगाती होंगी
आह!मई जून की अंगारों सी धरती
को कितनी जरूरत मेरी होगी..
ऐसा सोच कर अपना पहला
कदम वो भरती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..
अंतिम रात में आंखें मूंद..
अपने इसी त्याग और बलिदान
की कविता सुनाने...
सूरज का रास्ता तकती होगी...

वो बारिश की पहली बूंद...

Thursday, August 27, 2020

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत


पंत जी का प्रारंभिक नाम गुसाईं दत्त रखा गया था 1921 में महात्मा गांधी एवं असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ दिया था चौथी कक्षा में पंत जी ने कविता लिखनी शुरू की थी पंथ के प्रथम कविता गिरजे का घंटा सन् 1916 प्रकाशित हुई 

प्रसाद के काव्य को चार भागों में बांटा जा सकता है
 प्रथम चरण(छायावादी)
-उच्छवास 
-ग्रंथि 
-वीणा 
-पल्लव 
-गुंजन 
द्वितीय चरण (प्रगतिवादी युग)
- युगांत
- युगवाणी
-ग्राम्या 
तृतीय चरण (अरविंद दर्शन से प्रभावित)
-स्वर्ण किरण
- स्वर्ण धूलि
-युगांतर
-युगपथ
चतुर्थ चरण (मानवीय दर्शन से प्रभावित)
-रजत शिखर
- अतिमा
-वापी
-कला और बूढ़ा चांद
 -चिदंबरा
-लोकायतन
- खादी के फूल (बच्चन  जी  के साथ मिलकर लिखा)

Wednesday, August 26, 2020

कवि हरिवंश राय बच्चन (हालावादी कवि)


आप का जन्म 27 नवंबर 1907 के दिन बापूपट्टी गाँव, जिला प्रतापगढ़ में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध रचना “मधुशाला” आज भी श्रोताओं का मन मोह लेती है। श्रेष्ठतम कवि बच्चन जी कविता और लेखन योगदान के लिए पद्म भूषण विजेता भी बने।वह एक कायस्थ परिवार से थे। उनके माता-पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव और सरस्वती देवी था। छोटी आयु में उन्हे बच्चन नाम से पुकारा जाता था। जिसका अर्थ “बच्चा” होता है। जिस कारण आगे चल कर उनका सरनेम “बच्चन” हुआ। हकीकत में उनका सरनेम श्रीवास्तव है। आपकी रचनाएं: 

1.तेरा हार (1929)
 2.मधुशाला (1935)
3.मधुबाला (1936)
4.मधुकलश (1937)
5.आत्म परिचय (1937)
6.निशा निमंत्रण(1938,)
7.एकांत संगीत (1939)
8.आकुल अंतर (1943)
9.सतरंगिनी (1945)
10.हलाहल (1946)
11.बंगाल का काल (1946)
12.खादी के फूल (1948)
13.सूत की माला (1948)
14.मिलन यामिनी (1950)
15.प्रणय पत्रिका (1955)
16.धार के इधर-उधर (1957)
17.आरती और अंगारे (1958)
18.बुद्ध और नाचघर (1958)
19.त्रिभंगिमा (1961)
20.चार खेमे चौंसठ खूंटे (1962)
21.दो चट्टानें (1965)
22.बहुत दिन बीते (1967)
23.कटती प्रतिमाओं की आवाज़ (1968)
24.उभरते प्रतिमानों के रूप (1969)
25.जाल समेटा (1973)


बीसवीं सदी के नवीनतम और सुप्रसिद्ध कवि,“मधुशाला” के रचयिता, पद्म श्री से सम्मानित भी ।

5 सितंबर का दिन था (स्वरचित कविता)


5 सितंबर का दिन था..
मन यह सोचने में लीन था
जीवन का सुधारा किसने सीन था
इसी विचार से मैं थोड़ा खिन्न था।

5 सितंबर का दिन था..

एक ही मां के दो बच्चों में,
एक आदमी तो एक हैवान क्यों
एक ही पिता के दो बच्चों में,
एक पुलिस तो एक चोर क्यों?
एक ही कक्षा के सारे बच्चों में,
कुछ काबिल तो कुछ कमजोर क्यों?
एक ही समाज के लोगों में,
कुछ सेवी तो कुछ पापी क्यों?

5 सितंबर का दिन था..

जिंदगी के हर मोड़ पर शिक्षक मिले कई
पर सीखने के लिए शिक्षक का ही होना काफी नहीं
चींटी से भी सीख ली जा सकती है नई
अगर सीखने वाला सच्चा शिक्षार्थी हो कहीं

5 सितंबर का दिन था..

सबकी जिंदगी के रंगमंच में होता है अंतर
हालात और परिस्थिति से बड़ा नहीं कोई सिकंदर
आज तक जान न पाया कोई यह जंतर-मंतर
यह बन शिक्षक बदलता है सब का मुकद्दर

5 सितंबर का दिन था..

हालात और परिस्थिति के आगे झुकी हर पढ़ाई
तहे दिल से इन्हे ही शिक्षक दिवस की हो बधाई।

5 सितंबर का दिन था..

Tuesday, August 25, 2020

सफर, लाडो से लाडी तक का (स्वरचित कविता)




एक अनजाने घर के सामने
एक अनजानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरी किस्मत ने
घबराहट थी दिल की थाह मेंl

सब लोग दौड़ पड़े मेरी ओर,
लाडी आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर
मैं इठला पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडो हूं आपकी लाडी किस ठौर?

लोग नए, रिश्ते नए
घर नए ,परिवार नए
यहां तक की खिड़कियां नई
तो कबर्ड भी नएl

पर सच तो है यह सब नया नहीं,
पुराना दस्तूर है सदियों का कई

यह एक ही जिंदगी में मिलने वाला
औरत का दूसरा जन्म है सही?
मेरे साथ भी यह सब होने वाला
उस दिन,समझ ना पाईl

यह सिर्फ नया सफर ही नहीं,
इसकी मंजिल भी नई होगीl
अब से परिवार मेरा नहीं,
मैं परिवार के लिए होंऊंगीl
अब से मैं किसी की चिंता नहीं,
सारी चिंताएं मेरी होगीl
जी हां अब से मैं लाडो नहीं,
लाडी कहलाऊंगीl

खैर वक्त की तस्वीर बदलती गई,
रिश्तो की डोर सुलझती गई,
तनाव के नसे की मैं आदी होती गई
शायद दूसरा अध्याय समझती गईl

आज कई सालों बाद,

पुराने घर के सामने,
पुरानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरे हमसफ़र ने,
उत्साह था दिल की थाह में,

मां दौड़ी मेरी ओर,
लाडो आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर।
मैं मुस्कुरा पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडी हूं आपकी लाडो किस ठौर?

बहुत ही छोटा फेरबदल है इन शब्दों का
पर बहुत लंबा हैlसफर,लाडो से लाडी तक का l

Sunday, August 23, 2020

महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा




महादेवी वर्मा (26मार्च 1907 — 11 सितंबर 1987) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं।

 हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है। 

महादेवी ने दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया। 

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। 


इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया।

संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं।


उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं।

उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है।


 गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। वर्ष 2007उनकी जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया।


27अप्रैल 1982 को भारतीय साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था।


गूगल ने इस दिवस की याद में वर्ष2018 में गूगल डूडल के माध्यम से मनाया । 

कामायनीकार जयशंकर प्रसाद छायावादी चतुष्टय के कवि


30 जनवरी 1881- 14जनवरी 1937

1-प्रसाद जी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार और निबन्धकार थे। 

2-वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं lउन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की l
 3-उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचना की। उनकी रचनाएँ हैं;

* काव्य: झरना, आँसू, लहर, कामायनी, प्रेम पथिक
*नाटक: स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जन्मेजय का नाग यज्ञ, राज्यश्री, अजातशत्रु, विशाख, एक घूँट, कामना, करुणालय, कल्याणी परिणय, अग्निमित्र, प्रायश्चित, सज्जन

* कहानी संग्रह: छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल

*उपन्यास : कंकाल, तितली और इरावती ।

[बड़ा ही विचित्र ब्लॉक है जिसमें 2000 से अब तब के 140+ टेलीविजन सीरियलों के नाम हैl]


"जब कहानी तेरी मेरी होगी तब बनेगी अपनी बात"

आज की बात तबकि है जब मेरे स्कूल डेज थेlमेरे पापा अविनाश IPSऔर मां CID
दोनों अलग-अलग ऑफिस-ऑफिस में काम करते थेlमेरे एक भैया है उसका नाम श्री कृष्णा है वो कसम से इतनी शरारत करता है कि उसके सामने क्या मस्ती क्या धूम मची रहती हैंl

एक बार हम-दोनों आंगन में बैठकर कोरे-कागज पर कविता लिख रहे थे कि अचानक हमने आसमान पर तितलियों के साथ सोनपरी देखी फिर हमारे चाचा चौधरी ने आकर कहा आज तुम्हें कुछ कर दिखाना है तुम दोनों में से कौन बनेगा करोड़पति और कमजोर कड़ी कौन का पता चलेगा किसमें कितना है दम आज देखेंगे हम क्योंकि अब मैं पूछने वाला हूं सवाल 10 करोड़ का l

तभी मम्मी खाने खजाने मे से मिर्च मसालों की खिचड़ी बना कर लाई, रात हुई, उस दिन हमने एक टूटता तारा भी देखा l कैंपस की लाइट बंद हुईl

सुबह सवेरे मिस्टर एंड मिसेज माधुरी हमारे घर आए आते ही पूछा भाभी जी घर पर है वह शास्त्र विधि जानते थे ये उन दिनों की बात है जब हमारे घर में कभी हादसा तो कभी हकीकत होते रहते थे वहां की सन्नाटे और आहट सुनकर लगता शशशशशशश कोई है l मानो या ना मानो हर शनिवार को कोई ना कोई नया हॉरर शो तो होते रहते थे लगता था कि कोई सैटरडे सस्पेंस होlयह अनहोनी हमने उनसे बताई उन्होंने कहा या तो तुम महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण का पाठ करो या फिर तुम पिकनिक चले जाओlवास्तव में अभी तुम्हारी कुंडली में अनेक कसौटी जिंदगी की हैl सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद देकर चले गए l

हम उसी दिन कश्मीर चले गएl हम पांच सहेलियां गई थीl रास्ते में उस दिन तो तारक मेहता का उल्टा चश्मा लगाकर बिल्कुल रोडीज लग रही थी
मेरी सहेली कुसुम, देवी, हीना, अवंतिका और मैंl
हिना और अवंतिका का पति एक थाlएक दूसरे की कभी सौतन कभी सहेली थीl हम देवों के देव महादेव और सिद्धिविनायक के मंदिर से पहले घूमना चाहते थे इसलिए हम घूमने गए l

मेरी सहेली कुसुम और मेरे बीच में वैसे तो बड़ी तू-तू मैं-मैं होती है फिर भी हमने एक-दूजे के लिए कंगन, लिपस्टिक, चूड़ियां खरीदी lमैंने तो उसके लिए स्पेशल हरे कांच की चूड़ियां खरीदी उसने मेरे लिए कुमकुम खरीदा..कहते हैं वहां का कुमकुम- भाग्य है जो हर कदम पर शगुन करता है फिर हम सब कागज की कश्ती में बैठकर चिड़ियाघर, सर्कस, द्रोपदी और राजारांचू का नाटक देखने चले गए वहां से मेरी तीन सहेलियां अपने घर चली गई लेकिन कश्मीर में हमारा कौन अपना कौन पराया फिर हम दोनों मंदिर चले गए l

हमारे परिवार वाले लोग भी वहां पहुंच गएlअब हम सात-आठ हैंl हम सभी गुरुकुल की यात्रा के लिए जय माता की करते चले गए, वहां हमने कमल पर विराजमान मां लक्ष्मी जी मे आस्था जताई lवहां के  bigboss मतलब पुजारी जी का प्रवचन सुना और उन्होंने बताया कि घर एक मंदिर है,हर कहानी घर घर की, कहानी सात फेरों की समान होती है l कर्म करते जाओ क्योंकि सास भी कभी बहू थी l

पुजारी जी ने भी अपनी संतानों में से कृष्णा के साथ सात फेरे अर्जुन के साथ करवा लिएlकृष्णार्जुन अपने मां    बाबुल की दुआ लेकर, पवित्र रिश्ता बांधकर मेहंदी तेरे नाम की लगा कर, किसी की भाभी बनकर, पिया के घर    बालिका वधू बन चली गई l पहरेदार पिया की ने कुंडली भाग्य मे बदल दी.. अक्सर लोग पूछतेेे हैं ये रिश्ता क्या कहलाता है.. ये हैै मोहब्बतें जो दिल से दिल तक जाती हैं जिसमें इश्कबाज स्यापा इश्क को सद्दाहक़ समझते हैं

इतनी पवित्र रिश्ते देखकर हमारी दास्तान में शांति आ गई lफिर हमारी जिंदगी की स्प्लिट्सविला मे आती रही बहारें lहमने कोशिश एक आशा मानकर मेहनत कर माल कमाया, क्योंकि माल है तो ताल ले वरना हड़ताल है lवहां जाकर हम तो परदेसी हो गए पता ही नहीं चला कब देश में निकला होगा चांदl

ऐसी जन्नत को देखकर अपने कुटुम की याद आ गई मगर अफसोस कभी आई ना जुदाई वही बात हो गई मैं अपनी सहेलियों से जुदा हो गई मुझे उन पलों से जस्ट मोहब्बत, आशिकी हो चुकी थी l आज भी स्मृति में कैद है जैसे चांद के टुकडे हमने कलश में संजोकर रखेे हो..बिल्कुल सच जैसे कोई सच का सामना किया हो बड़े अच्छे लगते हैं वे पल l वहां का बसेरा देखकर सबकी हसरतें है है बढ़ जाती थी, लगता था कोई अपना सा है यहां लेकिन जब कोई है नहीं तो किसे अपना कहें यहां lहमारी दो लफ्जों की अधूरी कहानी बस इतनी ही है पर, दिल है कि मानता नहीं, हर वक्त पूछता रहता है क्यों होता है प्यार l

हमारा जोश खत्म नहीं हुआ हमने फिर अचानक 37 साल बाद का प्रोग्राम रखा..शायद हम सभी सहेलियों दुबारा मिल ना पाएं लेकिन फिर भी हमने पुनः मिलन का चैलेंज किया l

हर मोड़ पर, कहता है दिल, कहीं किसी रोज, कहीं तो मिलेंगे...

Saturday, August 22, 2020

मैं एक अनाथ (स्वरचित कविता)




जब उम्र थी तेरी
बना दिया तूने मुझे मांl
बस एक ही तो जिम्मेदारी थी,मेरी
क्या उसे भी तू ना निभापाइ मां!

जब उम्र थी हठ करने की मेरी
तू हठी बन गई मां,
खुद को ही बहलाता रहा,फुसलाता रहा
पर तू कहीं नजर नहीं आई मां!

जब उम्र थी मेरी,थामकर उंगली
चलने की तेरी
थमा दी छोटी-छोटी उंगलियां
खुद को ही मैंने मां!
नहीं था फैसला इस धरती पर आने का मेरा
नौ महीने कोख में रखकर
तू ही तो लाई थी ना मां!

जब उम्र थी,तेरे आंचल को ओढ़ने की मेरी,
जलता रहा तपती धूप में
सिर से नंगे पावों तक मेरी मां!
दर-दर भटकता,खोजता रहा हर पल..
छम छम करती दूर कहीं से तू आ जाए मां!

जब उम्र थी तुझसे लिपटकर रोने की मेरी
पोछती रही,आंखें
ये नन्हीं हथेलियां देर तक मेरी मां!
मां तो अपना बनाती है,
पर क्यों हुआ मैं उसी से पराया
ऐसा क्या हुआ,
जो ममता के बदले सजा मिली मुझे मां!

जानता हूं तू भी मुझे याद करती है ना मां!
तो क्यों नहीं आती,सामने तू मेरे मां,
प्यार नहीं तो नफरत ही सही
कुछ तो तेरा दे दे मां!
जिंदगी के इस उतराव में,
एक बार तेरी गोदी चढ़ने दे मां!

जब उम्र थी अच्छा बनाने की मुझे मां!
क्यों पहले ही बुरा बनकर तुझ गया मैं मां,
आज भी जिंदा है तेरे रूप में मेरा नाथ
फिर भी क्यों रह गया "मैं एक अनाथ"l

मैंने भगवान देखा है (स्वरचित कविता)


कौन कहता है भगवान नहीं होता,
मैंने देखा है भगवान
अपनी आंखों से देखा है भगवान
मन से महसूस किया है मैंने भगवानl

अपने ही सामने अपनी मां को खोते देखा है,
भगवान को मेरी मां बनते देखा है
दुर्भाग्य को भाग्य में बदलते देखा है
हां,दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

जब सोती हूं,चैन से..
रात मे चुपके से उनका आना,
मुझे ढंग से ओढा कर जानाl

वह भगवान नहीं तो और कौन है?

जब मैं देर तक नहीं जगती तो,
मेरे कमरे का दरवाजा बार-बार बंद करना..
मैं देर से उठू इसे लेकर,
दूसरों को नाराज ना होने देना..

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए अपने खाने का हिस्सा बचाना
दाल में दो-दो बार घी डालना
मेरे खाने के लिए मेरे पीछे-पीछे घूमनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए दुनिया से लड़ना
दुनिया के लिए मुझसे बनावटी झगड़ना
गुस्से में भी प्यार झलकानाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

पहले उनका मुझे डांटना,
फिर प्यार से माफी मांगना,
सारा गुनाह खुद का ही कबूल लेनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरी मुसीबत के सामने दीवार बनकर डट जाना,
मेरी खुशियों के लिए मॉम बनकर पिघल जाना,
मुझे औरों के सामने
अच्छा बनाने के लिए खुद को बुरा बना देनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

और यदि वो भगवान है तो ...
मेरे लिए वो मेरी दादी मां नहीं तो और कौन है?

कौन कहता है भगवान नहीं होता?

मैंने देखा है मेरी दादी मां में मेरा भगवान,
भाग्य से ही सही
लेकिन मैंने भगवान देखा है..

सच है दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

Friday, August 21, 2020

चतुर चितेरा (स्वरचित कविता)


इस जग का चित्र बड़ा निराला है,
कहीं खुशियां तो कहीं दुखियाला है,
कहीं अंधेरा तो कहीं उजियारा है,
कहीं कांटे तो कहीं फुलवारी है,
कहीं निराशा तो कहीं खुशहाली है,
कहीं पतझड़ तो कहीं हरियाली हैl

इस जग को ना जाने किसने बनाया है
अवश्य वह रंग भरने वाला चतुर चितेरा है
जिसने सतरंगी जहां रचाया है
एक रंग को भी ना पीछे छोड़ा है
सारे रंगों को अपने आंचल में छुपाया है
एक एक को सारे रंग दिखलाता हैl

बड़ी बारीकी से अपना काम करता है
लंबे समय तक एक को ना एक रंग पहनाता है
पर इंसान एक रंग को अपना रंग मान बैठता है
सारे रंगों से मिलकर खुशियों का रंग बनता है
रंगो के इस खेल में इंसान अभी अंजाना है
इस कारण इंसान रंगों की बाजी शीघ्र हार जाता हैl

तूने हजारों बार इंसान को उलझाया है
'एक रंग से दूसरा रंग बनता है'
हर रंग के बाद एक नया रंग आता है
रंगों के इस मैदान में तूने बहुत दौड़ाया हैl

भूल गया मुझे भी तो तूने बनाया है
रंगो की पहचान में ये मन अभी ना हारा है
रंगों की इस कशमकश को आज जीत पाया है
ये विभिन्न रंग नहीं मात्र आंखों का धोखा हैl

यही रंगों का राज आज तक कोई न जान पाया है
अभी भी एक सवाल मन मचलाता है
हे चतुर चितेरे!तू किस रंगीन मिट्टी से बना है
बता 'तुझे किसने बनाया है'l

अमूल्य फल (स्वरचित कविता)

खड़ा हूं एक सुंदर बगिया में,
दिख रहे हैं मीठे फल उन टहनियों में,
खुजली चल रही है मेरी हथेलियों में,
चमक रहे हैं सपने मेरी अंखियों मेंl

खाऊंगा जरूर सबसे मीठे फल को
जिऊंगा तब मैं हर एक उस पल को
मां-छुटकी को भी खिलालूंगा कल को
तभी नजर गई मेरे तल कोl

टूटा सपना एक क्षणिक में
बंट गया वह एक कणित मेंl

एडी ऊंची कर लड़ा हूं
फिर भी फल से दूर खड़ा हूं
शायद मैं बहुत छोटा हूं
इसलिए फल खाने में खूंटा हूंl

मैल नहीं है इसमें मेरा
खेल है ऊपर वाले तेराl

उस धनुषधारी ने किया ये अपमान
अब चुप बैठा है वह पार आसमान
उंगली ना बनाई उसने पांचों एक समान
उठाऊंगा मैं भी आज अपने दर्दों का तीर कमानl

सहसा एहसास हुआ खड़ा है कोई मेरे पीछे
उसे देखकर शर्म से हुए नेत्र मेरे नीचेl

था वह दोस्त मेरा मुनिया
देख नहीं सकता था वह दुनियाl

देख सकता हूं मैं हजार फलों को
वह देख नहीं सकता अपने ही पलों कोl

अब तक मन था मेरा सूखा गागर
बन गया है अब वह अपार सागरl

मिल गया जवाब मुझे एक तिल में
रखूंगा यह बात सदा मैं अपने दिल मेंl

जो ना मिला उसे भूलाकर
जो मिला है उसे पाकरl

बनूंगा एक नया सपना
तब नहीं चूकूंगा उसे बनाने में अपनाl

चंद पलों के लिए,
मांगा था एक मूल्यवान फल..
जिंदगी भर के लिए,
दे दिया तूने मुझे 'अमूल्य फल'l

Thursday, August 20, 2020

Maa:The most beautiful relation in the world to write about this relation I need a empty novel.[A beautiful prose composed by me]


Your greatness is really admirable.something different, something lovely.To be like you is out of reach for all
In your opinion,your son is like sun,Who is the one an only for earth.. you can sacrifice even your valuable life for your child.
You wake up all night to let sleep for your child..you sacrifice your dream for your child's dream.Sure,you have pain in your eyes but you say nothing.you sleep in whet so that you sleep in wheat so that you are child would be makeup dry.
Mother is spirit of child. The children would be lucky and they have fate who have mother. All the world is just like the forest,only you [maa] mother you are the flower of love and only you can make life your child without you nothing life and nothing world.
Love you mom.

जंग हो बस प्यार से (स्वरचित कविता)

सब के सब स्तब्ध खड़े हैं.
पास अपनों के सर काटे हैं..

घना सन्नाटा चारों ओर फैला है
देखने वालों के लिए
सूरज भी उस दिन का मेला है

बोझिल हवा बनी है बारूदो से..
खौफनाक वादिया बनी है चित्तकारों से

सहमें पक्षी घुस बैठे हैं घोसलों में
चिपकाकर शावकों को अपने पैरों में
और कहते हैं अपनी जुबान में
'दिल न रहा इंसानों में रूप बदला किसानों में

ऐसा किसान जो हथियार बोये
हल की जगह खेत बंदूकों से जोते
और परमाणु बम से उसे सीचें..

जबकि उसी के बच्चे रोटी को तरसे
भूख अकाल का बादल बरसे
अपनों का साया उठे बच्चों के सर से
हैवान बन गया है वह आमदर से

मां का सिसकना रातों में
उनका याद आना हर बातों में

बेजुबान बच्चे ने जुबान चलाई
'मां सुनी है क्यों तेरी कलाई
गर्व से बतलाई उस नौजवान की भलाई
यह सुखी आंसुओं की रेख,यह सुनी कलाई

पूछे किससे बस यह एक सवाल
क्यों हुआ दो भाइयों के बीच बवाल

क्यों जली यह जहरीली आग
कुछ नहीं,बस जलना था मेरा सुहाग

बता क्या बदली तेरी तस्वीर
हां!बस फूटी है तो मेरी तकदीर

क्यों होती है जंग हर रोज
क्यों ना तू बरसो खोया भाई खोज

क्यों बनी है यह सरहद बीच
पार-उस पार क्यों बेचता है ना चीज

इतने में एक आंसू सावक-आंख से आ लूढ़ा

पंछी उसे गला गले लगा हंसकर बोला
आदमी चाहता है बनना मौला
इसी होड़ में पहना है गंदा स्वार्थी चोला
तू क्यों रोता है ए भोला!

है हम ही सच्ची आजादी से लद
अपनी नहीं है,बंधन नहीं है,सरहद

है अपनी ही सारी जमीं
अंबर के स्वामी है हमीं

हम नदी और हवा के झोंके
हैं किसमें वह ताकत जो हमें रोके

जिस दिन इंसान ये कसम खाएगा
जंग को ना वह कभी आएगा
उस दिन का सूरज जब देखेगा
जब यह फासला ही मिट जाएगा
सच्ची आजादी जब वह समझेगा
तभी ये दर्द मिट पाएगा

और कहेगा अपने यार से..
आओ!दोस्त जंग लड़े नए हथियार से
नफरत से नहीं बस प्यार से...
जंग हो बस प्यार से

Wednesday, August 19, 2020

उड़ता देख पंछी (स्वरचित कविता)





मैं पर कटा पंछी...
उड़ता है पंछी

उस खुले आसमान में,
कभी यहां तो कभी वहां

लगता है सुहाना
खिलती है मुस्कान

पर रोता है मन..
काश पंख होते मेरे भी
उड़ता देख पंछी मैं भी
उस खुले आसमान में,
कभी यहां कभी वहां
उड़ता देख पंछी...

पर ना नीचे समझ मुझे तो इतना
मैं भी उठ सकता हूं उतना
तू क्या जाने दर्द मुझे दिया तूने ही कितना

पंख काट कर तूने उजड़ा मेरा घरौंदा
उस पर मेरे पंख लगाकर बन बैठा है तू परिंदा

पर तू ना कर अभिमान
होगा मेरा भी सम्मान

आएगा ऐसा समय भी
उडूंगा ए पंछी मैं भी

हारा नहीं है अभी दिल
उड़ना बाकी है अभी कई मील

कहता है मन-पंछी
उड़ता देख पंछी..

रामधारी सिंह दिनकर: लोह कवि


रामधारी सिंह दिनकर साहित्य
के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं 
जिनकी कलम में 
दिनकर यानी सूर्य के समान
 चमक थी lउनकी कविताएं सिर्फ़ 
उनके समय का सूरज नहीं हैं 
बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां
 प्रकाशमान होती हैंl
आप बिहार के 
सिमरिया गांव से थेl
कहा जाता है
 सिमरिया के गांव की हर दीवार पर आपकी पंक्तियां उकेरी हुई हैl
आप राज्यसभा की सदस्य रहे हुए हैंl
आप द्वितीय राष्ट्रकवि भी माने जाते हैंl

धूमिल:सुदामा पांडे



9 नवम्बर 1936-10 फरवरी 1975

*धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था"l

*उनका मूल नाम सुदामा पांडेय थाl उनके पिता का नाम पंडित शिवनायक था और माँ का नाम रसवंती देवी था l

*सन् 1958 में आई टी आई (वाराणसी) से विद्युत डिप्लोमा लेकर वे वहीं विदयुत अनुदेशक बन गयेl 
*38 वर्ष की अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई l

*व्यवस्था जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य हैl 

* साए की धूप का गजल संग्रह हैl

*उन्हें मरणोपरांत 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया l

 उनकी रचनाएँ हैं :
 
1-संसद से सड़क तक, 
2-कल सुनना मुझे,
3-सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र ।

मरुधरा का गौरव: ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जोधपुर (जोधपुर स्थापना दिवस) #12_मई

मरुधरा का गौरव: ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जोधपुर ​प्रस्तावना राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो मारवाड़ का ना...