Monday, August 31, 2020

मेरे स्कूल के दिन (स्वरचित कविता)


मेरे स्कूल के दिन...
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

मेरे स्कूल के दिन..

खिड़की के पर्दे से झांक रही हल्की रोशनी मे उठा करते थे
सीपी सी अध खुली आंखों से ही नहा लिया करते थे,
चटकीली नीली गगरी उस पर सफेद कमीज
पहन कहर ढाया करते थे,
लाल रिबन से दो चोटियों बांध घंटों शीशे के सामने खुद को संवारा करते थेl

आहा!मेरे स्कूल के दिन...

आज लंच बॉक्स में क्या है?मां जैसे सवाल
तो दिनचर्या के हिस्से हुआ करते थे,
घंटों रगड़ कर काले जूतों को भी सफेदी सा चमका दिया करते थे,
झुलते मौजों में रबड़ बांध उनमें जान फूंक दिया करते थे,
भले कबाड़ से जुगाड़ हो पर कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं किया करते थे,


मेरे स्कूल के दिन...

सुबह की घनघोर घटाओं से प्यारी चिड़िया की चहचहाहट हुआ करती थी,
उससे भी प्यारी दूर कहीं से आती हुई स्कूल की घंटी की आवाज हुआ करती थी,
पीटीआई मैडम के डर से मिनटों में सफर पैदल ही तय कर लिया करती थी,
रास्ते में हर बूढ़े इंसान से जय राम जी की काकी कह कर सारे रिश्तो के बीज बिखेरा करती थी,

मेरे स्कूल के दिन..

24 घंटों मे चंद पलों की प्रार्थना में न जाने आंखें खोलकर क्या राज देखा करती थी,
खुद की गलती ना पकड़े जाने पर अक्सर गढ़ जीत लिया करती थी,
सोमवार से आखिरी दिन तक यूनिफॉर्म को हथेली के छाले की तरह रखा करती थी,
क्योंकि उस वक्त इस्त्री सप्ताह में 1 दिन ही हुआ करती थी,
स्वच्छता अनुक्रमाणिका से लेकर सर्वश्रेष्ठ की अंक तालिका तक अक्सर में छाए रहा करती थी,
स्कूल की बाई जी मुझे लाडली कह कर पुकारा करती थी,
हर अध्यापक की में चहेती हुआ करती थी

मेरे स्कूल के दिन...

इंटरवल को हम रेसिस बोला करती थी,
पावलव थ्योरी के अनुसार न जाने क्यों रेसिस की घंटी बजने से ही तेज भूख लग जाया करती थी,
इंटरवल के आधे घंटे में जिंदगी की सारी हंसी खेल खेल लिया करती थी,
पर भाग्य से मेरी पकड़ने की बारी आती ही इंटरवेल की घंटी बज जाया करती थीl

मेरे स्कूल के दिन..

गणितीय सूत्र हो या रसायन सूत्र ट्रिक बनाकर
तोते की तरह ही रख लिया करती थी,
पर सामाजिक इतिहास के लंबे-लंबे पन्ने गिन कर ही घबरा जाया करती थी,
SUPW कैंप की तो बात ही क्या!
360 दिनों के बंदिश की भड़ास उन 5 दिनों की आजादी के जश्न में निकाल दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हमारी कक्षा प्रिंसिपल ऑफिस के पास लगा करती थी,
क्योंकि हम बदमाशी में भी अव्वल रहा करती थी,
बिन बातें हम सहेलियां घंटों बतलाया करती थी,
मुंह पर अंगुली रखने वाली सजा में दूसरी उंगली से स्लेट पर लिख लिख कर बातें किया करती थी..
वैकल्पिक प्रश्न पत्र तो हम इशारों में ही पूरे कर लिया करती थी,
एक नंबर गलत कट जाने पर अध्यापक से घंटों लड़ा करती थी,
और एक नंबर अतिरिक्त मिल जाने पर आईआईटी की डिग्री ही जीत लिया करती थी,
खुद से ज्यादा आरामदायक जगह तो अपने बैग को दिया करती थी,

मेरे स्कूल के दिन...

हम स्कूल को विद्या मंदिर कहा करती थी,
दोस्तों हम मां सरस्वती की सौगंध पर ही पूरा सच उगल लिया करती थी,
इन छोटी-छोटी बर्फ के टुकड़ों सी खुशियों से ही हम आनंद का हिमालय खड़ा कर लिया करती थी,
जी हां! हम तितलियों की तरह अपने गुलिस्ता की महारानियां कहलाया करती थी

मेरे स्कूल के दिन..
जैसे सुलझे बालों में,
उलझी पिन...
आज भी याद है

Saturday, August 29, 2020

वो बारिश की पहली बूंद (स्वरचित कविता)


वो बारिश की पहली बूंद,
अंतिम रात में आंखें मूंद,
सच करने को अपना सपना
सूरज का रास्ता ताकती होगीl

वो बारिश की पहली बूंद..

जानती तो वो सब कुछ होगी
फिर भी अनजान बनती होगी..
मंजिल से पहले ही धरती की
तपन में हस्ती मुझे खोनी होंगी..
जब जीवन ही मरण के लिए है तो
मरण का यही रास्ता चुनती होगी..
खुद को जलाकर अनुचर झड़ी
सखियों का रास्ता शीतल करती होगी

वो बारिश की पहली बूंद..

कुछ कर सके या ना कर
सके पर बहुत कुछ कर देगी..
इस दृढ़ विश्वास के साथ
अपना सामान बांधती होगी..
जब एक चिंगारी आग लगा दे तो
वो बूंद भी मेरी जैसी होगी..
जो महासागर बनाती होगी
रंगहीन होकर भी धरती
को रंगीन बना देगी
इसी उमंग में इंद्रधनुष के सारे रंगों से
रगड़ रगड़ कर वो नहाती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..

करोड़ों लोग मेरी एक झलक पाने को आतुर
यह सोच खुद को कितना सजाती होगी
गर्म लू के झोंके कहीं नजर ना लगा दे मुझे
सोच कर खुद को काजल का टीका लगाती होंगी
आह!मई जून की अंगारों सी धरती
को कितनी जरूरत मेरी होगी..
ऐसा सोच कर अपना पहला
कदम वो भरती होगी..

वो बारिश की पहली बूंद..
अंतिम रात में आंखें मूंद..
अपने इसी त्याग और बलिदान
की कविता सुनाने...
सूरज का रास्ता तकती होगी...

वो बारिश की पहली बूंद...

Thursday, August 27, 2020

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत


पंत जी का प्रारंभिक नाम गुसाईं दत्त रखा गया था 1921 में महात्मा गांधी एवं असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ दिया था चौथी कक्षा में पंत जी ने कविता लिखनी शुरू की थी पंथ के प्रथम कविता गिरजे का घंटा सन् 1916 प्रकाशित हुई 

प्रसाद के काव्य को चार भागों में बांटा जा सकता है
 प्रथम चरण(छायावादी)
-उच्छवास 
-ग्रंथि 
-वीणा 
-पल्लव 
-गुंजन 
द्वितीय चरण (प्रगतिवादी युग)
- युगांत
- युगवाणी
-ग्राम्या 
तृतीय चरण (अरविंद दर्शन से प्रभावित)
-स्वर्ण किरण
- स्वर्ण धूलि
-युगांतर
-युगपथ
चतुर्थ चरण (मानवीय दर्शन से प्रभावित)
-रजत शिखर
- अतिमा
-वापी
-कला और बूढ़ा चांद
 -चिदंबरा
-लोकायतन
- खादी के फूल (बच्चन  जी  के साथ मिलकर लिखा)

Wednesday, August 26, 2020

कवि हरिवंश राय बच्चन (हालावादी कवि)


आप का जन्म 27 नवंबर 1907 के दिन बापूपट्टी गाँव, जिला प्रतापगढ़ में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध रचना “मधुशाला” आज भी श्रोताओं का मन मोह लेती है। श्रेष्ठतम कवि बच्चन जी कविता और लेखन योगदान के लिए पद्म भूषण विजेता भी बने।वह एक कायस्थ परिवार से थे। उनके माता-पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव और सरस्वती देवी था। छोटी आयु में उन्हे बच्चन नाम से पुकारा जाता था। जिसका अर्थ “बच्चा” होता है। जिस कारण आगे चल कर उनका सरनेम “बच्चन” हुआ। हकीकत में उनका सरनेम श्रीवास्तव है। आपकी रचनाएं: 

1.तेरा हार (1929)
 2.मधुशाला (1935)
3.मधुबाला (1936)
4.मधुकलश (1937)
5.आत्म परिचय (1937)
6.निशा निमंत्रण(1938,)
7.एकांत संगीत (1939)
8.आकुल अंतर (1943)
9.सतरंगिनी (1945)
10.हलाहल (1946)
11.बंगाल का काल (1946)
12.खादी के फूल (1948)
13.सूत की माला (1948)
14.मिलन यामिनी (1950)
15.प्रणय पत्रिका (1955)
16.धार के इधर-उधर (1957)
17.आरती और अंगारे (1958)
18.बुद्ध और नाचघर (1958)
19.त्रिभंगिमा (1961)
20.चार खेमे चौंसठ खूंटे (1962)
21.दो चट्टानें (1965)
22.बहुत दिन बीते (1967)
23.कटती प्रतिमाओं की आवाज़ (1968)
24.उभरते प्रतिमानों के रूप (1969)
25.जाल समेटा (1973)


बीसवीं सदी के नवीनतम और सुप्रसिद्ध कवि,“मधुशाला” के रचयिता, पद्म श्री से सम्मानित भी ।

5 सितंबर का दिन था (स्वरचित कविता)


5 सितंबर का दिन था..
मन यह सोचने में लीन था
जीवन का सुधारा किसने सीन था
इसी विचार से मैं थोड़ा खिन्न था।

5 सितंबर का दिन था..

एक ही मां के दो बच्चों में,
एक आदमी तो एक हैवान क्यों
एक ही पिता के दो बच्चों में,
एक पुलिस तो एक चोर क्यों?
एक ही कक्षा के सारे बच्चों में,
कुछ काबिल तो कुछ कमजोर क्यों?
एक ही समाज के लोगों में,
कुछ सेवी तो कुछ पापी क्यों?

5 सितंबर का दिन था..

जिंदगी के हर मोड़ पर शिक्षक मिले कई
पर सीखने के लिए शिक्षक का ही होना काफी नहीं
चींटी से भी सीख ली जा सकती है नई
अगर सीखने वाला सच्चा शिक्षार्थी हो कहीं

5 सितंबर का दिन था..

सबकी जिंदगी के रंगमंच में होता है अंतर
हालात और परिस्थिति से बड़ा नहीं कोई सिकंदर
आज तक जान न पाया कोई यह जंतर-मंतर
यह बन शिक्षक बदलता है सब का मुकद्दर

5 सितंबर का दिन था..

हालात और परिस्थिति के आगे झुकी हर पढ़ाई
तहे दिल से इन्हे ही शिक्षक दिवस की हो बधाई।

5 सितंबर का दिन था..

Tuesday, August 25, 2020

सफर, लाडो से लाडी तक का (स्वरचित कविता)




एक अनजाने घर के सामने
एक अनजानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरी किस्मत ने
घबराहट थी दिल की थाह मेंl

सब लोग दौड़ पड़े मेरी ओर,
लाडी आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर
मैं इठला पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडो हूं आपकी लाडी किस ठौर?

लोग नए, रिश्ते नए
घर नए ,परिवार नए
यहां तक की खिड़कियां नई
तो कबर्ड भी नएl

पर सच तो है यह सब नया नहीं,
पुराना दस्तूर है सदियों का कई

यह एक ही जिंदगी में मिलने वाला
औरत का दूसरा जन्म है सही?
मेरे साथ भी यह सब होने वाला
उस दिन,समझ ना पाईl

यह सिर्फ नया सफर ही नहीं,
इसकी मंजिल भी नई होगीl
अब से परिवार मेरा नहीं,
मैं परिवार के लिए होंऊंगीl
अब से मैं किसी की चिंता नहीं,
सारी चिंताएं मेरी होगीl
जी हां अब से मैं लाडो नहीं,
लाडी कहलाऊंगीl

खैर वक्त की तस्वीर बदलती गई,
रिश्तो की डोर सुलझती गई,
तनाव के नसे की मैं आदी होती गई
शायद दूसरा अध्याय समझती गईl

आज कई सालों बाद,

पुराने घर के सामने,
पुरानी गली की राह में,
गाड़ी रोकी मेरे हमसफ़र ने,
उत्साह था दिल की थाह में,

मां दौड़ी मेरी ओर,
लाडो आई सुनाई दिया कुछ ऐसा ही शोर।
मैं मुस्कुरा पड़ी इस कोर,
मैं तो लाडी हूं आपकी लाडो किस ठौर?

बहुत ही छोटा फेरबदल है इन शब्दों का
पर बहुत लंबा हैlसफर,लाडो से लाडी तक का l

Sunday, August 23, 2020

महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा




महादेवी वर्मा (26मार्च 1907 — 11 सितंबर 1987) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं।

 हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है। 

महादेवी ने दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया। 

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। 


इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया।

संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं।


उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं।

उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है।


 गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। वर्ष 2007उनकी जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया।


27अप्रैल 1982 को भारतीय साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था।


गूगल ने इस दिवस की याद में वर्ष2018 में गूगल डूडल के माध्यम से मनाया । 

कामायनीकार जयशंकर प्रसाद छायावादी चतुष्टय के कवि


30 जनवरी 1881- 14जनवरी 1937

1-प्रसाद जी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार और निबन्धकार थे। 

2-वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं lउन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की l
 3-उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचना की। उनकी रचनाएँ हैं;

* काव्य: झरना, आँसू, लहर, कामायनी, प्रेम पथिक
*नाटक: स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जन्मेजय का नाग यज्ञ, राज्यश्री, अजातशत्रु, विशाख, एक घूँट, कामना, करुणालय, कल्याणी परिणय, अग्निमित्र, प्रायश्चित, सज्जन

* कहानी संग्रह: छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल

*उपन्यास : कंकाल, तितली और इरावती ।

[बड़ा ही विचित्र ब्लॉक है जिसमें 2000 से अब तब के 140+ टेलीविजन सीरियलों के नाम हैl]


"जब कहानी तेरी मेरी होगी तब बनेगी अपनी बात"

आज की बात तबकि है जब मेरे स्कूल डेज थेlमेरे पापा अविनाश IPSऔर मां CID
दोनों अलग-अलग ऑफिस-ऑफिस में काम करते थेlमेरे एक भैया है उसका नाम श्री कृष्णा है वो कसम से इतनी शरारत करता है कि उसके सामने क्या मस्ती क्या धूम मची रहती हैंl

एक बार हम-दोनों आंगन में बैठकर कोरे-कागज पर कविता लिख रहे थे कि अचानक हमने आसमान पर तितलियों के साथ सोनपरी देखी फिर हमारे चाचा चौधरी ने आकर कहा आज तुम्हें कुछ कर दिखाना है तुम दोनों में से कौन बनेगा करोड़पति और कमजोर कड़ी कौन का पता चलेगा किसमें कितना है दम आज देखेंगे हम क्योंकि अब मैं पूछने वाला हूं सवाल 10 करोड़ का l

तभी मम्मी खाने खजाने मे से मिर्च मसालों की खिचड़ी बना कर लाई, रात हुई, उस दिन हमने एक टूटता तारा भी देखा l कैंपस की लाइट बंद हुईl

सुबह सवेरे मिस्टर एंड मिसेज माधुरी हमारे घर आए आते ही पूछा भाभी जी घर पर है वह शास्त्र विधि जानते थे ये उन दिनों की बात है जब हमारे घर में कभी हादसा तो कभी हकीकत होते रहते थे वहां की सन्नाटे और आहट सुनकर लगता शशशशशशश कोई है l मानो या ना मानो हर शनिवार को कोई ना कोई नया हॉरर शो तो होते रहते थे लगता था कि कोई सैटरडे सस्पेंस होlयह अनहोनी हमने उनसे बताई उन्होंने कहा या तो तुम महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण का पाठ करो या फिर तुम पिकनिक चले जाओlवास्तव में अभी तुम्हारी कुंडली में अनेक कसौटी जिंदगी की हैl सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद देकर चले गए l

हम उसी दिन कश्मीर चले गएl हम पांच सहेलियां गई थीl रास्ते में उस दिन तो तारक मेहता का उल्टा चश्मा लगाकर बिल्कुल रोडीज लग रही थी
मेरी सहेली कुसुम, देवी, हीना, अवंतिका और मैंl
हिना और अवंतिका का पति एक थाlएक दूसरे की कभी सौतन कभी सहेली थीl हम देवों के देव महादेव और सिद्धिविनायक के मंदिर से पहले घूमना चाहते थे इसलिए हम घूमने गए l

मेरी सहेली कुसुम और मेरे बीच में वैसे तो बड़ी तू-तू मैं-मैं होती है फिर भी हमने एक-दूजे के लिए कंगन, लिपस्टिक, चूड़ियां खरीदी lमैंने तो उसके लिए स्पेशल हरे कांच की चूड़ियां खरीदी उसने मेरे लिए कुमकुम खरीदा..कहते हैं वहां का कुमकुम- भाग्य है जो हर कदम पर शगुन करता है फिर हम सब कागज की कश्ती में बैठकर चिड़ियाघर, सर्कस, द्रोपदी और राजारांचू का नाटक देखने चले गए वहां से मेरी तीन सहेलियां अपने घर चली गई लेकिन कश्मीर में हमारा कौन अपना कौन पराया फिर हम दोनों मंदिर चले गए l

हमारे परिवार वाले लोग भी वहां पहुंच गएlअब हम सात-आठ हैंl हम सभी गुरुकुल की यात्रा के लिए जय माता की करते चले गए, वहां हमने कमल पर विराजमान मां लक्ष्मी जी मे आस्था जताई lवहां के  bigboss मतलब पुजारी जी का प्रवचन सुना और उन्होंने बताया कि घर एक मंदिर है,हर कहानी घर घर की, कहानी सात फेरों की समान होती है l कर्म करते जाओ क्योंकि सास भी कभी बहू थी l

पुजारी जी ने भी अपनी संतानों में से कृष्णा के साथ सात फेरे अर्जुन के साथ करवा लिएlकृष्णार्जुन अपने मां    बाबुल की दुआ लेकर, पवित्र रिश्ता बांधकर मेहंदी तेरे नाम की लगा कर, किसी की भाभी बनकर, पिया के घर    बालिका वधू बन चली गई l पहरेदार पिया की ने कुंडली भाग्य मे बदल दी.. अक्सर लोग पूछतेेे हैं ये रिश्ता क्या कहलाता है.. ये हैै मोहब्बतें जो दिल से दिल तक जाती हैं जिसमें इश्कबाज स्यापा इश्क को सद्दाहक़ समझते हैं

इतनी पवित्र रिश्ते देखकर हमारी दास्तान में शांति आ गई lफिर हमारी जिंदगी की स्प्लिट्सविला मे आती रही बहारें lहमने कोशिश एक आशा मानकर मेहनत कर माल कमाया, क्योंकि माल है तो ताल ले वरना हड़ताल है lवहां जाकर हम तो परदेसी हो गए पता ही नहीं चला कब देश में निकला होगा चांदl

ऐसी जन्नत को देखकर अपने कुटुम की याद आ गई मगर अफसोस कभी आई ना जुदाई वही बात हो गई मैं अपनी सहेलियों से जुदा हो गई मुझे उन पलों से जस्ट मोहब्बत, आशिकी हो चुकी थी l आज भी स्मृति में कैद है जैसे चांद के टुकडे हमने कलश में संजोकर रखेे हो..बिल्कुल सच जैसे कोई सच का सामना किया हो बड़े अच्छे लगते हैं वे पल l वहां का बसेरा देखकर सबकी हसरतें है है बढ़ जाती थी, लगता था कोई अपना सा है यहां लेकिन जब कोई है नहीं तो किसे अपना कहें यहां lहमारी दो लफ्जों की अधूरी कहानी बस इतनी ही है पर, दिल है कि मानता नहीं, हर वक्त पूछता रहता है क्यों होता है प्यार l

हमारा जोश खत्म नहीं हुआ हमने फिर अचानक 37 साल बाद का प्रोग्राम रखा..शायद हम सभी सहेलियों दुबारा मिल ना पाएं लेकिन फिर भी हमने पुनः मिलन का चैलेंज किया l

हर मोड़ पर, कहता है दिल, कहीं किसी रोज, कहीं तो मिलेंगे...

Saturday, August 22, 2020

मैं एक अनाथ (स्वरचित कविता)




जब उम्र थी तेरी
बना दिया तूने मुझे मांl
बस एक ही तो जिम्मेदारी थी,मेरी
क्या उसे भी तू ना निभापाइ मां!

जब उम्र थी हठ करने की मेरी
तू हठी बन गई मां,
खुद को ही बहलाता रहा,फुसलाता रहा
पर तू कहीं नजर नहीं आई मां!

जब उम्र थी मेरी,थामकर उंगली
चलने की तेरी
थमा दी छोटी-छोटी उंगलियां
खुद को ही मैंने मां!
नहीं था फैसला इस धरती पर आने का मेरा
नौ महीने कोख में रखकर
तू ही तो लाई थी ना मां!

जब उम्र थी,तेरे आंचल को ओढ़ने की मेरी,
जलता रहा तपती धूप में
सिर से नंगे पावों तक मेरी मां!
दर-दर भटकता,खोजता रहा हर पल..
छम छम करती दूर कहीं से तू आ जाए मां!

जब उम्र थी तुझसे लिपटकर रोने की मेरी
पोछती रही,आंखें
ये नन्हीं हथेलियां देर तक मेरी मां!
मां तो अपना बनाती है,
पर क्यों हुआ मैं उसी से पराया
ऐसा क्या हुआ,
जो ममता के बदले सजा मिली मुझे मां!

जानता हूं तू भी मुझे याद करती है ना मां!
तो क्यों नहीं आती,सामने तू मेरे मां,
प्यार नहीं तो नफरत ही सही
कुछ तो तेरा दे दे मां!
जिंदगी के इस उतराव में,
एक बार तेरी गोदी चढ़ने दे मां!

जब उम्र थी अच्छा बनाने की मुझे मां!
क्यों पहले ही बुरा बनकर तुझ गया मैं मां,
आज भी जिंदा है तेरे रूप में मेरा नाथ
फिर भी क्यों रह गया "मैं एक अनाथ"l

मैंने भगवान देखा है (स्वरचित कविता)


कौन कहता है भगवान नहीं होता,
मैंने देखा है भगवान
अपनी आंखों से देखा है भगवान
मन से महसूस किया है मैंने भगवानl

अपने ही सामने अपनी मां को खोते देखा है,
भगवान को मेरी मां बनते देखा है
दुर्भाग्य को भाग्य में बदलते देखा है
हां,दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

जब सोती हूं,चैन से..
रात मे चुपके से उनका आना,
मुझे ढंग से ओढा कर जानाl

वह भगवान नहीं तो और कौन है?

जब मैं देर तक नहीं जगती तो,
मेरे कमरे का दरवाजा बार-बार बंद करना..
मैं देर से उठू इसे लेकर,
दूसरों को नाराज ना होने देना..

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए अपने खाने का हिस्सा बचाना
दाल में दो-दो बार घी डालना
मेरे खाने के लिए मेरे पीछे-पीछे घूमनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरे लिए दुनिया से लड़ना
दुनिया के लिए मुझसे बनावटी झगड़ना
गुस्से में भी प्यार झलकानाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

पहले उनका मुझे डांटना,
फिर प्यार से माफी मांगना,
सारा गुनाह खुद का ही कबूल लेनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

मेरी मुसीबत के सामने दीवार बनकर डट जाना,
मेरी खुशियों के लिए मॉम बनकर पिघल जाना,
मुझे औरों के सामने
अच्छा बनाने के लिए खुद को बुरा बना देनाl

वो भगवान नहीं तो और कौन है?

और यदि वो भगवान है तो ...
मेरे लिए वो मेरी दादी मां नहीं तो और कौन है?

कौन कहता है भगवान नहीं होता?

मैंने देखा है मेरी दादी मां में मेरा भगवान,
भाग्य से ही सही
लेकिन मैंने भगवान देखा है..

सच है दोस्तों!मैंने भगवान देखा हैl

Friday, August 21, 2020

चतुर चितेरा (स्वरचित कविता)


इस जग का चित्र बड़ा निराला है,
कहीं खुशियां तो कहीं दुखियाला है,
कहीं अंधेरा तो कहीं उजियारा है,
कहीं कांटे तो कहीं फुलवारी है,
कहीं निराशा तो कहीं खुशहाली है,
कहीं पतझड़ तो कहीं हरियाली हैl

इस जग को ना जाने किसने बनाया है
अवश्य वह रंग भरने वाला चतुर चितेरा है
जिसने सतरंगी जहां रचाया है
एक रंग को भी ना पीछे छोड़ा है
सारे रंगों को अपने आंचल में छुपाया है
एक एक को सारे रंग दिखलाता हैl

बड़ी बारीकी से अपना काम करता है
लंबे समय तक एक को ना एक रंग पहनाता है
पर इंसान एक रंग को अपना रंग मान बैठता है
सारे रंगों से मिलकर खुशियों का रंग बनता है
रंगो के इस खेल में इंसान अभी अंजाना है
इस कारण इंसान रंगों की बाजी शीघ्र हार जाता हैl

तूने हजारों बार इंसान को उलझाया है
'एक रंग से दूसरा रंग बनता है'
हर रंग के बाद एक नया रंग आता है
रंगों के इस मैदान में तूने बहुत दौड़ाया हैl

भूल गया मुझे भी तो तूने बनाया है
रंगो की पहचान में ये मन अभी ना हारा है
रंगों की इस कशमकश को आज जीत पाया है
ये विभिन्न रंग नहीं मात्र आंखों का धोखा हैl

यही रंगों का राज आज तक कोई न जान पाया है
अभी भी एक सवाल मन मचलाता है
हे चतुर चितेरे!तू किस रंगीन मिट्टी से बना है
बता 'तुझे किसने बनाया है'l

अमूल्य फल (स्वरचित कविता)

खड़ा हूं एक सुंदर बगिया में,
दिख रहे हैं मीठे फल उन टहनियों में,
खुजली चल रही है मेरी हथेलियों में,
चमक रहे हैं सपने मेरी अंखियों मेंl

खाऊंगा जरूर सबसे मीठे फल को
जिऊंगा तब मैं हर एक उस पल को
मां-छुटकी को भी खिलालूंगा कल को
तभी नजर गई मेरे तल कोl

टूटा सपना एक क्षणिक में
बंट गया वह एक कणित मेंl

एडी ऊंची कर लड़ा हूं
फिर भी फल से दूर खड़ा हूं
शायद मैं बहुत छोटा हूं
इसलिए फल खाने में खूंटा हूंl

मैल नहीं है इसमें मेरा
खेल है ऊपर वाले तेराl

उस धनुषधारी ने किया ये अपमान
अब चुप बैठा है वह पार आसमान
उंगली ना बनाई उसने पांचों एक समान
उठाऊंगा मैं भी आज अपने दर्दों का तीर कमानl

सहसा एहसास हुआ खड़ा है कोई मेरे पीछे
उसे देखकर शर्म से हुए नेत्र मेरे नीचेl

था वह दोस्त मेरा मुनिया
देख नहीं सकता था वह दुनियाl

देख सकता हूं मैं हजार फलों को
वह देख नहीं सकता अपने ही पलों कोl

अब तक मन था मेरा सूखा गागर
बन गया है अब वह अपार सागरl

मिल गया जवाब मुझे एक तिल में
रखूंगा यह बात सदा मैं अपने दिल मेंl

जो ना मिला उसे भूलाकर
जो मिला है उसे पाकरl

बनूंगा एक नया सपना
तब नहीं चूकूंगा उसे बनाने में अपनाl

चंद पलों के लिए,
मांगा था एक मूल्यवान फल..
जिंदगी भर के लिए,
दे दिया तूने मुझे 'अमूल्य फल'l

Thursday, August 20, 2020

Maa:The most beautiful relation in the world to write about this relation I need a empty novel.[A beautiful prose composed by me]


Your greatness is really admirable.something different, something lovely.To be like you is out of reach for all
In your opinion,your son is like sun,Who is the one an only for earth.. you can sacrifice even your valuable life for your child.
You wake up all night to let sleep for your child..you sacrifice your dream for your child's dream.Sure,you have pain in your eyes but you say nothing.you sleep in whet so that you sleep in wheat so that you are child would be makeup dry.
Mother is spirit of child. The children would be lucky and they have fate who have mother. All the world is just like the forest,only you [maa] mother you are the flower of love and only you can make life your child without you nothing life and nothing world.
Love you mom.

जंग हो बस प्यार से (स्वरचित कविता)

सब के सब स्तब्ध खड़े हैं.
पास अपनों के सर काटे हैं..

घना सन्नाटा चारों ओर फैला है
देखने वालों के लिए
सूरज भी उस दिन का मेला है

बोझिल हवा बनी है बारूदो से..
खौफनाक वादिया बनी है चित्तकारों से

सहमें पक्षी घुस बैठे हैं घोसलों में
चिपकाकर शावकों को अपने पैरों में
और कहते हैं अपनी जुबान में
'दिल न रहा इंसानों में रूप बदला किसानों में

ऐसा किसान जो हथियार बोये
हल की जगह खेत बंदूकों से जोते
और परमाणु बम से उसे सीचें..

जबकि उसी के बच्चे रोटी को तरसे
भूख अकाल का बादल बरसे
अपनों का साया उठे बच्चों के सर से
हैवान बन गया है वह आमदर से

मां का सिसकना रातों में
उनका याद आना हर बातों में

बेजुबान बच्चे ने जुबान चलाई
'मां सुनी है क्यों तेरी कलाई
गर्व से बतलाई उस नौजवान की भलाई
यह सुखी आंसुओं की रेख,यह सुनी कलाई

पूछे किससे बस यह एक सवाल
क्यों हुआ दो भाइयों के बीच बवाल

क्यों जली यह जहरीली आग
कुछ नहीं,बस जलना था मेरा सुहाग

बता क्या बदली तेरी तस्वीर
हां!बस फूटी है तो मेरी तकदीर

क्यों होती है जंग हर रोज
क्यों ना तू बरसो खोया भाई खोज

क्यों बनी है यह सरहद बीच
पार-उस पार क्यों बेचता है ना चीज

इतने में एक आंसू सावक-आंख से आ लूढ़ा

पंछी उसे गला गले लगा हंसकर बोला
आदमी चाहता है बनना मौला
इसी होड़ में पहना है गंदा स्वार्थी चोला
तू क्यों रोता है ए भोला!

है हम ही सच्ची आजादी से लद
अपनी नहीं है,बंधन नहीं है,सरहद

है अपनी ही सारी जमीं
अंबर के स्वामी है हमीं

हम नदी और हवा के झोंके
हैं किसमें वह ताकत जो हमें रोके

जिस दिन इंसान ये कसम खाएगा
जंग को ना वह कभी आएगा
उस दिन का सूरज जब देखेगा
जब यह फासला ही मिट जाएगा
सच्ची आजादी जब वह समझेगा
तभी ये दर्द मिट पाएगा

और कहेगा अपने यार से..
आओ!दोस्त जंग लड़े नए हथियार से
नफरत से नहीं बस प्यार से...
जंग हो बस प्यार से

Wednesday, August 19, 2020

उड़ता देख पंछी (स्वरचित कविता)





मैं पर कटा पंछी...
उड़ता है पंछी

उस खुले आसमान में,
कभी यहां तो कभी वहां

लगता है सुहाना
खिलती है मुस्कान

पर रोता है मन..
काश पंख होते मेरे भी
उड़ता देख पंछी मैं भी
उस खुले आसमान में,
कभी यहां कभी वहां
उड़ता देख पंछी...

पर ना नीचे समझ मुझे तो इतना
मैं भी उठ सकता हूं उतना
तू क्या जाने दर्द मुझे दिया तूने ही कितना

पंख काट कर तूने उजड़ा मेरा घरौंदा
उस पर मेरे पंख लगाकर बन बैठा है तू परिंदा

पर तू ना कर अभिमान
होगा मेरा भी सम्मान

आएगा ऐसा समय भी
उडूंगा ए पंछी मैं भी

हारा नहीं है अभी दिल
उड़ना बाकी है अभी कई मील

कहता है मन-पंछी
उड़ता देख पंछी..

रामधारी सिंह दिनकर: लोह कवि


रामधारी सिंह दिनकर साहित्य
के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं 
जिनकी कलम में 
दिनकर यानी सूर्य के समान
 चमक थी lउनकी कविताएं सिर्फ़ 
उनके समय का सूरज नहीं हैं 
बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां
 प्रकाशमान होती हैंl
आप बिहार के 
सिमरिया गांव से थेl
कहा जाता है
 सिमरिया के गांव की हर दीवार पर आपकी पंक्तियां उकेरी हुई हैl
आप राज्यसभा की सदस्य रहे हुए हैंl
आप द्वितीय राष्ट्रकवि भी माने जाते हैंl

धूमिल:सुदामा पांडे



9 नवम्बर 1936-10 फरवरी 1975

*धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था"l

*उनका मूल नाम सुदामा पांडेय थाl उनके पिता का नाम पंडित शिवनायक था और माँ का नाम रसवंती देवी था l

*सन् 1958 में आई टी आई (वाराणसी) से विद्युत डिप्लोमा लेकर वे वहीं विदयुत अनुदेशक बन गयेl 
*38 वर्ष की अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई l

*व्यवस्था जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य हैl 

* साए की धूप का गजल संग्रह हैl

*उन्हें मरणोपरांत 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया l

 उनकी रचनाएँ हैं :
 
1-संसद से सड़क तक, 
2-कल सुनना मुझे,
3-सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र ।

हुआ सवेरा जाग(स्वरचित कविता)


जाग बेटा जाग...
हुआ सवेरा जाग

सपनों की दुनिया तोड़
कल्पना आकाश छोड़

हकीकत का समझ महत्व
उठ निभाना है तुझे दायित्व

सुन बेटा सुन...
तेरे खिलौने की धुन
तू ही है उसका खून
वह है तेरे बिन सून

बोल बेटा बोल...
मन का आपा खोल
खिलौना है तेरे अनमोल
दिला दें उनका अपना मोल

पुकार बेटा पुकार...
अपने खिलौनों की झंकार
तू है उनकी खनकार
छोड़ अपना अंधकार
प्रकाश का बंद हकदार

जाग बेटा जाग
हुआ सवेरा जाग....

Tuesday, August 18, 2020

कल्पना सृजन




एक घर हो अपना(स्वरचित कविता)


इन बेजुबान सुस्त आंखों में,
जगा एक सपना..
दिल के रिश्तो से बना,
प्यार के मध्य कर हो अपना..

ना ईर्ष्या का हो आलम,
ना नफरत का हो तूफान..
दिल की महासागर में,
बस प्यार ही प्यार का हो उफान..

जहां हर रात
सुबह जल्दी उठने का हो जोश..
दिनभर की उस
चहल-पहल में रहे ना मुझे अपना होश..

मां मे गौरी
पाऊं और बाबा में शिव..
इन्हीं के आशीर्वाद से
उस आशियाने की खुदी हो नीव..

जहां सबका मन हो निर्मल नीर..
बिन कहे सब एक समझे एक दूसरे की पीर..

इन चंचल शरारती आंखों में,
चमका एक ख्वाब..
इस जहां का सबसे प्यारा,
हो मेरे दिल का नवाब..

सहना पाए हम पल भर के लिए भी
एक दूसरे की जुदाई..
ऐसी परिवार के लिए होगी वफाई
अगर करदूं अपनी जान के साथ बेवफाई..

इन बेजुबान सुस्त आंखों में.....

Friday, August 14, 2020

It's nature[ composed by me ]


Man sees "Sun is shining."
Without caring "it burn itself for him"

Man sees "Rain is running."
Without caring "it destroy itself for him."

Man sees "Nature is looking nice."
Without caring "it Explorer itself for him."

Man sees "Soil is spread all over."
Without caring "it bears everything for him."

Man sees "Water is tapping."
Without caring "it change itself for him."

Men sees "flower is real beauty."
Without caring "it Blossoms with thorn for him."

Man sees "fruit is sweet."
Without caring "Seed blasts itself for him."
     on the other hand

 all these things sees "man is delighting"
 without caring  "Man is the biggest enemy for them."

आतंकवाद से संबंधित कविता "बर्दाश्त की हद" (स्वरचित कविता)

क्या तारीफ ए काबिल है?बर्दाश्त की यह हद
दिनों दिन फेंकी जा रही है,मौतें बारूदो में लद
अचरज नहीं है,मुझे आतंकवादियों की गति से
अचरज है,मुझे अपनों पर अपनों की मति से|

लाल हो गया गुलाबी शहर,
गुजरात में भी फैल गया जहर,
बम की ज्वाला फटती आठों पहर,
अब तो उठाओ,बदलाव की एक लहर|

वक्त था,जब एक मौत पर,
पूरा देश मातम मनाता था..
वक्त था जब एक सिसकी पर,
पूरा देश बिलकता था..
वक्त था जब एक आंसू पर,
पूरा देश हंसना भूल जाता था..
वक्त था जब एक पुकार पर,
पूरा देश दौड़ पड़ता था..

आज तो कर्राह उठी,मेरे देश की राजधानी
छर्रा से छिद् गए मासूम बच्चे व बहुरानी
देखते रहे हम वह कहलाने वाली स्वाभिमानी
आखिर कैसे सह पाए,सिरफिरौ की यह मनमानी

देश के पहरूओं!इस आग को बुझाने के लिए जरूरत नहीं है पानी की,
जरूरत है,एक और चिंगारीअपने दिल में उठाने की|

लो पुकारा है,हमने पूरे देश को
मिटा दो हाथ पर हाथ धरे इस परिवेश को

तोड़ दो सारे फिजूल की कस्टम
पूरा बदल ही दो देश का यह सिस्टम

हर घर में जन्मे एम.सी.शर्मा जैसी औलाद
एक नारा और लगा दो 'भारत छोड़ो आतंकवाद'|

देख रहे हैं,बारंबार बना खबर इन्हें हम टी.वी.स्क्रीन पर..
जान लीजिए आतंकवाद के अगले
हम ही है निशाने पर..

अगर जान कर भी हम चुप हैं बेहद
तो शर्म की काबिल है 'बर्दाश्त की हद'||

आरम्भ हैं प्रचण्ड...

आरम्भ है प्रचण्ड, बोले मस्तकों के झुंड आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो आन बान शान या कि जान का हो दान आज इक धनुष के बाण पे उतार दो आरम्भ है प...